यूं तो पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ ही तमाम राज्यों की इकाईयों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है लेकिन छत्तीसगढ़ की भूमिका कुछ अहम रही. छत्तीसगढ़ बीजेपी इकाई को बंगाल की 56 सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जहां भाजपा नेताओं ने घर- घर जाकर चुनावी योजना को अमलीजामा पहनाने के साथ ही बूथ मैनेजमेंट में भी बखूबी काम किया. दरअसल मजबूत बूथ बीजेपी के किसी भी चुनाव का सबसे बड़ा आधार होता है, और बंगाल में भी वही हुआ.
छत्तीसगढ़ भाजपा के नेताओं ने बंगाल चुनाव में माइक्रो प्लानिंग पर मजबूती से काम किया. माइक्रो प्लानिंग का स्लोगन था- बूथ जीतेंगे, चुनाव जीतेंगे. इसके लिए बाकयदा बूथ स्तर पर वोटर लिस्ट का गहन विष्लेषण किया गया. हर बूथ पर कार्यकर्ताओं की तैनाती की गई और यह सुनिश्चित किया गया कि अधिकतम वोटिंग हो. इसके लिए मतदाताओं से घर- घर जाकर संपर्क और उन्हें सुबह सबसे पहले वोटिंग यानी “पहले मतदान फिर जलपान” के लिए प्रेरित किया गया.
बंगाल चुनाव के दौरान सबसे अहम काम केंद्रीय नेताओं की सभाओं के प्रबंधन का था. उनमें भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभाओं के लिए भीड़ प्रबंधन से लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बैठाने का जिम्मा छत्तीसगढ़ की टीम के पास ही था. टीम ने केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई ताकि केंद्रीय नेतृत्व का संदेश जनता तक पहुंच सके.
छत्तीसगढ़ बीजेपी टीम की संगठनात्मक सूझबूझ चुनाव प्रचार में काम आई. टीम ने विधानसभा क्षेत्रों को क्लस्टर्स में बांटकर माइक्रो प्लानिंग पर काम किया और प्रभावी चुनावी प्रबंधन के साथ पार्टी के एजेंडे को घर-घर तक पहुंचाने के साथ ही विपक्ष के मुद्दों की काट भी स्थानीय कार्यकर्ताओं को दी. यही कारण रहा कि छत्तीसगढ़ टीम की रणनीति और मेहनत ने अपना रंग दिखाया और पहली बार पश्चिम बंगाल में कमल खिल सका.