सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने सोमवार को अपने परिवार के साथ बागेश्वर धाम प्रमुख पंडित धीरेंद्र शास्त्री के साथ मुलाकात की. यह मुलाकात निजी थी, लेकिन इसकी तस्वीरें सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं. कई वरिष्ठ वकीलों और कानूनी जानकारों ने इसे न्यायपालिका की गरिमा से जोड़ते हुए चिंता जताई, जबकि कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा बताया है.
इस पूरे मामले का केंद्र केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि उससे जुड़ी प्रतीकात्मकता है. आलोचकों का मानना है कि जब देश के सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश किसी विवादित धार्मिक व्यक्तित्व के साथ सार्वजनिक रूप से दिखाई देता है, तो इससे संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि ऐसी तस्वीरें न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकती हैं. उनके अनुसार, यह केवल निजी आस्था का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी से जुड़ा विषय भी है.
प्रशातं भूषण ने इस मुलाकात को लेकर एक्स पर लिखा, 'उन्हें अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा है. भूषण ने तंज कसते हुए पूछा कि एक विवादित कथावाचक के साथ सार्वजनिक रूप से दिखकर जस्टिस गवई न्यायपालिका और देश को क्या संदेश देना चाहते हैं.' उन्होंने धीरेंद्र शास्त्री को 'नफरत फैलाने वाला' बताते हुए इस मुलाकात को न्यायिक मर्यादा के खिलाफ बताया.
Can’t believe my eyes! Former CJI Gavai with a hate spewing fraudman! What kind of message is he sending to the judiciary! Shocking! pic.twitter.com/13SKL3Ih4c
— Prashant Bhushan (@pbhushan1) April 22, 2026
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख हैं और पिछले कुछ वर्षों में तेजी से चर्चा में आए हैं. उनके ‘दिव्य दरबार’ और चमत्कारों के दावों ने उन्हें लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया है. हालांकि, उनके कई बयान विवादों में भी रहे हैं, जिनमें सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर दिए गए कथन शामिल हैं. यही कारण है कि उनके साथ किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की मुलाकात अक्सर चर्चा और आलोचना दोनों को जन्म देती है. इस पृष्ठभूमि ने ही इस मुलाकात को और अधिक संवेदनशील बना दिया.
तस्वीरें सामने आते ही सोशल मीडिया पर दो स्पष्ट धड़े बन गए. एक पक्ष का कहना है कि हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार किसी से भी मिलने का अधिकार है, चाहे वह न्यायाधीश ही क्यों न हो. वहीं दूसरा पक्ष इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा है. उनका तर्क है कि उच्च पदों पर बैठे लोगों को अपने सार्वजनिक आचरण में अधिक सावधानी बरतनी चाहिए. इस बहस में कई कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी राय रखी, जिससे मुद्दा और व्यापक हो गया.