नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के फैसले को एक महीना बीतने के बाद अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है. इस फैसले में अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को सीमित करते हुए केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही कानूनी संरक्षण देने की बात कही गई थी. पर्यावरणविदों का मानना है कि इस निर्णय से अरावली क्षेत्र के बड़े हिस्से को खनन के लिए खोलने का रास्ता साफ हो गया है. इसी के विरोध में सोशल मीडिया पर #SaveAravalli और #SaveAravallisSaveAQI जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं.
इस अभियान में ग्रामीण समुदायों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, छात्रों और राजनेताओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिल रही है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कई नेताओं ने अपनी प्रोफाइल तस्वीर बदलकर समर्थन जताया है. वायरल पोस्ट और अपीलों के जरिए अरावली को होने वाले संभावित पारिस्थितिक नुकसान को लेकर चिंता जताई जा रही है.
ऑनलाइन विरोध अब जमीनी आंदोलन का रूप ले रहा है. पर्यावरणविदों और ग्रामीण संगठनों ने 21 दिसंबर को सुबह 10 बजे से एक दिन के प्रतीकात्मक उपवास का निर्णय लिया है. यह विरोध हरियाणा के भिवानी जिले की तोशाम पहाड़ी पर केंद्रित रहेगा, जो अरावली का सबसे उत्तरी हिस्सा है. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि ऊंचाई आधारित नियम को वापस लिया जाए ताकि निचली पहाड़ियों को भी खनन से बचाया जा सके.
करीब दो अरब साल पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला लगभग 692 किलोमीटर लंबी है और दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात से होकर गुजरती है. यह थार रेगिस्तान से आने वाली रेत को रोकने में अहम भूमिका निभाती है. साथ ही भूजल पुनर्भरण, वायु प्रदूषण नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण में भी इसका योगदान है. अरावली के जंगल लाखों लोगों के लिए जल, चारा, औषधीय जड़ी-बूटियों और आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आंतरिक आकलन में सामने आया कि इस परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है. राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही इस मानक पर खरी उतरती हैं.
अरावली विरासत जन अभियान को राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है. प्रतिनिधिमंडलों ने दिल्ली में सांसदों से मुलाकात कर संसदीय चर्चा की मांग की है. आदिवासी और किसान संगठनों का कहना है कि यह फैसला उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान पर सीधा असर डालेगा.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि संकीर्ण परिभाषा से मरुस्थलीकरण बढ़ सकता है और जल स्रोतों व वन्यजीव आवासों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है. उनकी मांग है कि पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला को महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित कर सभी प्रकार के खनन पर पूर्ण रोक लगाई जाए.