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'शादीशुदा महिला को दूसरे पुरुष के साथ फोटो...', मैरिड लाइफ और सोशल मीडिया पोस्ट पर जयपुर फैमिली कोर्ट की अहम टिप्पणी

राजस्थान के जयपुर की फैमली कोर्ट में अनोखा मामला आया. इस मामले पर न्यायाधीश ने भी अनोखी टिप्पणी दी है. अदालत की ओर से कहा गया कि किसी भी शादी-शुदा महिला को किसी दूसरे पुरुष के साथ ली गई फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करना अनुचित है.

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Edited By: Shanu Sharma
'शादीशुदा महिला को दूसरे पुरुष के साथ फोटो...', मैरिड लाइफ और सोशल मीडिया पोस्ट पर जयपुर फैमिली कोर्ट की अहम टिप्पणी
Courtesy: Grok AI

राजस्थान की राजधानी जयपुर की फैमली कोर्ट ने वैवाहिक जीवन और सोशल मीडिया के आचरण को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने साफ कहा कि सोशल मीडिया पर किया गया अनुचित व्यवहार वैवाहिक संबंधों की नींव को हिला सकता है और इसे कानूनी रूप से गंभीरता से लिया जाएगा.

पारिवारिक न्यायालय की न्यायाधीश आरती भारद्वाज ने 17 अप्रैल को दिए एक आदेश में कहा कि यदि कोई विवाहित महिला किसी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक तस्वीरें खिंचवाती है और उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से साझा करती है, तो यह पति के प्रति मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है.

क्या है पति का आरोप?

न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऐसे आचरण से पति को गंभीर भावनात्मक पीड़ा पहुंचती है, उसकी गरिमा प्रभावित होती है और सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस लगती है. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी. जिसमें पति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी उसके साथ लगातार दुर्व्यवहार करती है, अपशब्दों का प्रयोग करती है और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करती है. साथ ही पत्नी पति पर अपने माता-पिता से अलग रहने का दबाव भी बनाती थी. हालांकि, मामले में सबसे प्रमुख मुद्दा पत्नी का सोशल मीडिया आचरण ही रहा.

कोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले की शिकायत करने वाले व्यक्ति के वकील डीएस शेखावत ने शनिवार को इस आदेश की जानकारी देते हुए बताया कि अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि सोशल मीडिया गतिविधियां अब वैवाहिक विवादों में महत्वपूर्ण सबूत बन सकती हैं, खासकर जब इनसे भावनात्मक आघात या अपमान होता हो.

न्यायाधीश भारद्वाज ने अपने आदेश में कहा कि विवाहित व्यक्ति की जिम्मेदारी केवल घरेलू सीमाओं तक ही नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी है. सार्वजनिक मंच पर ऐसे आचरण जो वैवाहिक पवित्रता और विश्वास को तोड़ते हैं, उन्हें कानूनी रूप से मानसिक क्रूरता माना जा सकता है. हालांकि अदालत की इस टिप्पणी पर लोगों का दोहरा रिएक्शन देखने को मिल रहा है. कुछ लोगों इसे सही मान रहें हैं, वहीं कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ बता रहे हैं.