राफेल के लिए बढ़ा खतरा! अमेरिका ने F-16 को जीवनदान देकर पाकिस्तान को दिया दलाली का इनाम
अमेरिका ने 488 मिलियन डॉलर की F-16 रडार सपोर्ट डील में पाकिस्तान को शामिल किया है. इससे पहले भी उसे बड़ा अपग्रेड पैकेज मिल चुका है. चलिए जानते हैं इस कदम से क्षेत्रीय रणनीति पर क्या असर पड़ेगा.
नई दिल्ली: ईरान और US के बीच तनाव के माहौल में पाकिस्तान जिसने खुद को एक मध्यस्थ के तौर पर पेश किया है उसको अपनी मध्यस्थता की कोशिशों का इनाम मिला है. पाकिस्तान US की एक बड़ी रक्षा डील का लाभार्थी बन गया है. US वायुसेना ने नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन के साथ $488 मिलियन का एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है, जिसके तहत पाकिस्तान उन देशों में शामिल हो गया है जिन्हें अपने F-16 लड़ाकू विमानों के रडार सिस्टम के लिए तकनीकी और इंजीनियरिंग सपोर्ट मिलेगा.
यह डील ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान, ईरान और US के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है. लगातार आ रही रिपोर्टों से पता चलता है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पाकिस्तान ने सिर्फ एक संदेशवाहक की भूमिका नहीं निभाई है बल्कि कई मौकों पर उसने US के पक्ष को आगे बढ़ाने की सक्रिय कोशिशें भी की हैं. दूसरी ओर US यह नहीं चाहता कि पाकिस्तान की F-16 क्षमताएं कमजोर पड़ें बल्कि उसका मकसद इन विमानों को लंबे समय तक चालू और अपडेटेड रखना है.
इस डील में क्या शामिल है?
इस समझौते के तहत APG-66 और APG-68 जैसे आधुनिक रडार सिस्टम के लिए सपोर्ट दिया जाएगा. यह काम 2036 तक जारी रहने की उम्मीद है, जिसका मकसद F-16 लड़ाकू विमानों की ऑपरेशनल क्षमताओं को बनाए रखना और उन्हें अपग्रेड करना है. हालांकि इस कॉन्ट्रैक्ट का फायदा सिर्फ पाकिस्तान को ही नहीं मिलेगा बल्कि इजरायल, कतर, मिस्र और तुर्की जैसे कई अन्य देश भी इसमें शामिल हैं. इस घटनाक्रम का एक अहम पहलू यह है कि पाकिस्तान ने यह फायदा ऐसे समय में हासिल किया है जब वह US के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है.
यह कोई पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले दिसंबर 2025 में अमेरिका ने पाकिस्तान के F-16 बेड़े के लिए खास तौर पर $686 मिलियन के एक बड़े अपग्रेड पैकेज को मंजूरी दे दी थी. इसमें Link-16 सिस्टम, क्रिप्टोग्राफ़िक उपकरण, एवियोनिक्स अपग्रेड और ट्रेनिंग शामिल थे. उस समय अमेरिका ने साफ तौर पर कहा था कि यह कदम उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के हित में है.
अमेरिका की रणनीति क्या है?
अमेरिका का दावा है कि इस तरह के सौदे उसके सहयोगियों की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करते हैं और उन्हें भविष्य के खतरों का मुकाबला करने में मदद करते हैं. हालांकि असल में अमेरिका अपने सहयोगियों को अपने ही सिस्टम से जोड़कर रखना चाहता है ताकि वह इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए रख सके. जाहिर है अफगानिस्तान, भारत और ईरान ये तीनों ही इस सौदे पर पैनी नजर रखेंगे.
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