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पर्दे पर मुस्कान, दिल में छुपा दर्द... अधूरी रह गई वैलेंटाइन पर जन्मी इस एक्ट्रेस की कहानी

हिंदी सिनेमा की मशहूर एक्ट्रेस मधुबाला ने बचपन में ही परिवार की जिम्मेदारी उठाई. 9 साल की उम्र में फिल्मों में कदम रखा और दिल की बीमारी से जूझते हुए भी काम जारी रखा. उनकी जिंदगी चमक के पीछे छिपे संघर्ष की मार्मिक कहानी है.

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Edited By: Babli Rautela
पर्दे पर मुस्कान, दिल में छुपा दर्द... अधूरी रह गई वैलेंटाइन पर जन्मी इस एक्ट्रेस की कहानी
Courtesy: Instagram

मुंबई: हिंदी फिल्म जगत में Madhubala का नाम आज भी आकर्षण और मासूमियत के साथ लिया जाता है. परदे पर उनकी मुस्कान जितनी रोशन दिखती थी, असल जिंदगी उतनी ही चुनौतियों से भरी रही. उनका जन्म 14 फरवरी 1933 को दिल्ली में एक पश्तून मुस्लिम परिवार में हुआ. बचपन का नाम मुमताज जहां बेगम देहलवी था. परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था और सदस्यों की संख्या भी ज्यादा थी. ऐसे माहौल में उनका बचपन आम बच्चों जैसा नहीं रहा. खेलकूद और पढ़ाई की जगह जिम्मेदारियां उनके हिस्से आईं.

सिर्फ नौ साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों में कदम रखा. यह फैसला किसी सपने का नहीं बल्कि घर की जरूरत का नतीजा था. कैमरे के सामने खड़े होना उस उम्र में आसान नहीं था, लेकिन हालात ने उन्हें जल्दी परिपक्व बना दिया. 1942 में आई फिल्म बसंत ने उनके करियर को नई दिशा दी. इसी दौर में उनका नाम बदलकर मधुबाला रखा गया, जो आगे चलकर पहचान बन गया. काम के प्रति उनकी लगन और सहज अभिनय ने उन्हें जल्द ही फिल्मकारों की पसंद बना दिया.

मुगल-ए-आजम की अनारकली से बनाई पहचान

1950 का दशक उनके जीवन का स्वर्णिम अध्याय साबित हुआ. महल, तराना, हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी और हाफ टिकट जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया. हर भूमिका में वह अलग रंग भर देती थीं. चाहे प्रेम कहानी हो या हल्की फुल्की कॉमेडी, उनका अंदाज दर्शकों को बांधे रखता था. उस समय अभिनेत्रियों को सीमित अवसर मिलते थे, फिर भी उन्होंने अपने दम पर मजबूत स्थान बनाया. कहा जाता है कि उन्होंने अपने काम की शर्तें खुद तय कीं और अपनी मेहनत की कीमत भी पहचानी.

उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में मुगल-ए-आजम का नाम प्रमुख है. इस ऐतिहासिक कृति में निभाया गया अनारकली का किरदार आज भी याद किया जाता है. फिल्म की शूटिंग के दौरान वह गंभीर हृदय रोग से जूझ रही थीं. कई बार तबीयत बिगड़ने के बावजूद उन्होंने काम जारी रखा. भारी पोशाक और कठिन दृश्यों के बीच भी उन्होंने पेशेवराना जिम्मेदारी निभाई. दर्द को चेहरे पर आने नहीं दिया और मुस्कान को अपनी ताकत बना लिया.

36 साल की उम्र में बीमारी से निधन

व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें सुख कम ही मिला. बीमारी धीरे धीरे बढ़ती गई और काम के अवसर घटते चले गए. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. अपनी सीमाओं के बावजूद उन्होंने आत्मविश्वास बनाए रखा. 23 फरवरी 1969 को मात्र 36 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. कम समय में उन्होंने जो उपलब्धि हासिल की, वह असाधारण मानी जाती है.

आज जब हिंदी सिनेमा के इतिहास की चर्चा होती है तो मधुबाला का नाम सम्मान से लिया जाता है. उनकी यात्रा बताती है कि संघर्ष इंसान को तोड़ता नहीं, बल्कि गढ़ता है. चमकदार पर्दे के पीछे छिपी उनकी मेहनत और साहस उन्हें अमर बनाते हैं. उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं, बल्कि हिम्मत और समर्पण की मिसाल है.