पश्चिम बंगाल में ममता दीदी की हार और बीजेपी की जीत ने राजनीति को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. जहां हार के बाद भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता ने साफ कहा कि वह पद नहीं छोड़ेंगी और राजभवन नहीं जाएंगी. उनके इस बयान के बाद राज्य में संवैधानिक स्थिति और राज्यपाल की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं की राज्यपाल आगे क्या करेंगे और उनके पास संवैधानिक विकल्प क्या है.
ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनके इस्तीफा देने का कोई सवाल नहीं उठता है. उन्होंने इसे नैतिक जीत बताते हुए कहा कि वे आगे की रणनीति पार्टी नेताओं के साथ तय करेंगी. ममता ने बीजेपी और चुनाव आयोग पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि वे अब सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगी. उनका यह रुख राज्य की राजनीति में टकराव को और बढ़ाने वाला माना जा रहा है.
कानून के जानकारों की मानें तो अगर मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करती हैं तो राज्यपाल के पास सरकार को बर्खास्त करने का ऑप्शन होता है. जानकारों के हिसाब से चुनाव आयोग द्वारा जनादेश जारी होने के बाद संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी होता है. जब तक कोई अदालत अलग आदेश न दे तब तक मौजूदा सरकार को नियमों का पालन करना होगा.
संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल की कृपा पर मुख्यमंत्री पद पर बने रहते हैं. ऐसे में राज्यपाल मुख्यमंत्री को इस्तीफा देने की सलाह दे सकते हैं और मना करने पर उन्हें पद से हटा भी सकते हैं. इसके अलावा विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर राज्यपाल सदन को भंग कर सकते हैं और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं.
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री के इस्तीफा न देने के बावजूद नई विधानसभा के गठन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. राज्यपाल नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं और नए मुख्यमंत्री को शपथ दिला सकते हैं. हालांकि इस पूरे मामले में राजनीतिक समीकरण, संभावित गठबंधन और अदालत के हस्तक्षेप की भूमिका भी अहम मानी जा रही है.