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बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप केस में 5 दोषियों को उम्रकैद, पीड़ित मां-बेटी को नौ साल बाद मिला इंसाफ

बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप मामले में नौ साल बाद अदालत का फैसला आया है. पॉक्सो कोर्ट ने पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, जिससे पीड़ित परिवार को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिला.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप केस में 5 दोषियों को उम्रकैद, पीड़ित मां-बेटी को नौ साल बाद मिला इंसाफ
Courtesy: social media

बुलंदशहर: उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हाईवे पर मां और नाबालिग बेटी के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था. नौ साल तक चले दर्द, डर और सामाजिक बहिष्कार के बाद अब पीड़ित परिवार को न्याय मिला है. 

बुलंदशहर की पॉक्सो अदालत ने इस जघन्य अपराध में दोषी पाए गए पांच आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. यह फैसला सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि पीड़िताओं के संघर्ष की मान्यता भी है.

नौ साल बाद आया इंसाफ का फैसला

बुलंदशहर की पॉक्सो अदालत ने 22 दिसंबर 2025 को इस बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाया. कोर्ट ने पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा के साथ 1.80 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया. जुर्माने की राशि दोनों पीड़िताओं में बराबर बांटी जाएगी. अदालत ने माना कि यह अपराध न केवल शारीरिक हिंसा था, बल्कि पीड़ित परिवार के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाला अपराध था.

2016 की वो रात, जिसने सब कुछ बदल दिया

29 जुलाई 2016 की रात पीड़ित परिवार नोएडा से शाहजहांपुर जा रहा था. रास्ते में उनकी कार को जानबूझकर रोका गया. हथियारों से लैस आरोपियों ने पूरे परिवार को बंधक बना लिया और मां व 14 वर्षीय बेटी को झाड़ियों में ले जाकर सामूहिक दुष्कर्म किया. यह घटना इतनी भयावह थी कि उस रात के बाद परिवार का जीवन पूरी तरह बदल गया.

मामले की लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया

इस केस में कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था. मुकदमे के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई, जबकि दो आरोपी अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए. तीन आरोपियों को सबूतों के अभाव में क्लीन चिट मिली. अंततः पांच आरोपियों को दोषी ठहराया गया, जिन पर आईपीसी और पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत सजा सुनाई गई.

पीड़िता के डर, पलायन और संघर्ष

घटना के समय 14 साल की रही पीड़िता ने बताया कि इस अपराध ने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी. परिवार को पहचान छिपाने के लिए नौ साल में पांच बार घर बदलना पड़ा. हर जगह डर, ताने और पीछा करने की घटनाओं ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया. आज भी वह कई रातें डर के साये में जागते हुए गुजारती है.

न्याय की उम्मीद और भविष्य का संकल्प

लगातार स्थान बदलने से परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो गई. पिता, जो कभी टैक्सी चलाकर सम्मानजनक कमाई करते थे, अब सीमित आय पर निर्भर हैं. इसके बावजूद पीड़िता ने हार नहीं मानी. वह कानून की पढ़ाई कर रही है और जज बनकर अन्य पीड़ितों को न्याय दिलाने का सपना देखती है. यह फैसला उसके उस संकल्प को नई ताकत देता है.