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कॉलेज छोड़ा तो कॉर्पोरेट ने रौंदा! सामने आया 9 से 6 की शिफ्ट का सच

कॉर्पोरेट लाइफ के दूर से देखने में ही अच्छी और रोमांचक लगती है. पास से इसका एक अलग ही रूप दिखाई देता है. कथित तौर पर 9 से 6 की शिफ्ट होती है असल में तो सच्चाई इससे बिलकुल इतर होती है.

Meenu Singh
Edited By: Meenu Singh
कॉलेज छोड़ा तो कॉर्पोरेट ने रौंदा! सामने आया 9 से 6 की शिफ्ट का सच
Courtesy: Pinterest

नई दिल्ली: कॉलेज से निकलकर कॉर्पोरेट दुनिया में कदम रखना जितना रोमांचक लगता है, उतना ही यह अनुभव कई बार चैलेजिंग भी होता है. खासकर बड़े शहरों में 9 से 6 की नौकरी बाहर से जितनी सधी और आसान दिखती है, अंदर से वह उतनी ही थकाने वाली और समय खपाने वाली हो सकती है. फ्रेशर्स के लिए यह बदलाव सिर्फ नौकरी शुरू करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके पूरे लाइफस्टाइल को बदल देता है.

नोएडा जैसे शहरों में काम करने वाले कई युवा बताते हैं कि तय ऑफिस टाइमिंग के बावजूद दिन का बड़ा हिस्सा काम और उससे जुड़ी तैयारियों में ही निकल जाता है. कई युवा जोकि नोएडा जॉब के लिए आए हैं वो बताते हैं कि नौकरी का वास्तविक अनुभव उनकी उम्मीदों से काफी अलग रहा. उनके अनुसार, यह सिर्फ 9 से 6 की ड्यूटी नहीं, बल्कि पूरे दिन की मानसिक और शारीरिक भागदौड़ है.

पहली नौकरी का असली अनुभव

पहली जॉब का एक्सपीरियंस अक्सर लोगों के लिए बेहद खास होता है साथ ही यह सिखाती है कि असल में समय और एनर्जी कहां खर्च हो रही है. लेकिन  कभी-कभी पहली नौकरी रियलिटी चेक देती है.  

ऑफिस जाने से पहले की तैयारियां, ट्रैवल और काम के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करना—ये सब मिलाकर दिन काफी पहले शुरू हो जाता है. वहीं, ऑफिस के बाद भी काम का असर खत्म नहीं होता, जिससे आराम का समय सीमित हो जाता है.

 मानसिक थकान बनती है बड़ी चुनौती

कॉर्पोरेट जॉब में असली मुश्किल शारीरिक थकान नहीं बल्कि मानसिक दबाव है. पूरे दिन फोकस बनाए रखना, टारगेट पूरे करना और परफॉर्मेंस का दबाव व्यक्ति को अंदर से थका देता है. नतीजतन, शाम का समय जो पहले शौक या रिलैक्सेशन के लिए होता था, अब सिर्फ आराम या सोने में बीत जाता है, वह भी बिना किसी खास सटिस्फैक्शन के.

अकेले रहना बढ़ाता है जिम्मेदारियां

कॉर्पोरेट लाइफ की सबसे बड़ी चुनौती तो अकेले रहना होता है. नए शहर में अकेले रहना सबसे मुश्किल होता है. ऑफिस के बाद घर के काम करना, खाना बनाना और अपनी रूटीन बैलेंस करना एक अतिरिक्त जिम्मेदारी बन जाती है. ये समय सिर्फ प्रोफेशनल ग्रोथ का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और खुद को मैनेज करने का भी होता है.

वर्क-लाइफ बैलेंस बनाना जरूरी

समय के साथ एहसास होता है कि वर्क-लाइफ बैलेंस अपने आप नहीं मिलता, बल्कि इसे बनाना पड़ता है. अब ऑफिस के बाद अपने सेहत, नई स्किल्स और पर्सनल विकास पर ध्यान देते हैं. युवाओं का मानना है कि ऑफिस के बाद का समय उतना ही अहम है, जितना कि ऑफिस में बिताया गया समय, क्योंकि यही संतुलन लंबे समय में जीवन को बेहतर बनाता है.