'आपदा में अवसर', पश्चिम एशिया संकट से अफ्रीका पर होगी नोटों की बारिश? खाड़ी देशों के लिए बनेगा हीरो
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और अहम जलमार्गों पर अनिश्चितता ने शिपिंग कंपनियों को नए रास्ते तलाशने पर मजबूर कर दिया है. इसका सीधा अफ्रीका को हुआ है. अफ्रीका अब धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रैफिक का नया केंद्र बनकर उभर रहा है.
नई दिल्ली: वैश्विक व्यापार की धड़कन माने जाने वाले समुद्री मार्ग इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं. मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और अहम जलमार्गों पर अनिश्चितता ने शिपिंग कंपनियों को नए रास्ते तलाशने पर मजबूर कर दिया है. इसका सीधा अफ्रीका को हुआ है. अफ्रीका अब धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रैफिक का नया केंद्र बनकर उभर रहा है.
हाल के महीनों में होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर क्षेत्र में अस्थिरता के कारण पारंपरिक समुद्री आपूर्ति बाधित हुई है. इसके चलते जहाज मालिकों ने वैकल्पिक मार्ग अपनाने शुरू कर दिए हैं, जिनमें समुद्री और जमीनी परिवहन का मिश्रण शामिल है. खासतौर पर खाड़ी देशों तक सामान पहुंचाने के लिए नए लॉजिस्टिक नेटवर्क विकसित किए जा रहे हैं.
जेद्दा बना नया ट्रांजिट हब
लाल सागर के किनारे स्थित जेद्दा इस्लामिक पोर्ट अब एक अहम केंद्र बन चुका है. बड़ी शिपिंग कंपनियां जैसे MSC, CMA CGM, Maersk और Cosco अपने जहाज स्वेज नहर के जरिए यहां भेज रही हैं. इसके बाद सामान को ट्रकों से सऊदी अरब के रास्ते अन्य खाड़ी देशों तक पहुंचाया जा रहा है. हालांकि, अचानक बढ़े दबाव के कारण इस बंदरगाह पर भीड़भाड़ और देरी की समस्या सामने आ रही है.
नए कॉरिडोर का विकास
स्थिति को संभालने के लिए ओमान के सोहर और यूएई के खोरफक्कन व फुजैरा जैसे बंदरगाहों का उपयोग बढ़ा है. ये स्थान सड़क मार्ग से खाड़ी देशों से जुड़े हैं. वहीं, जॉर्डन का अकाबा पोर्ट इराक तक आपूर्ति का अहम केंद्र बन गया है, जबकि तुर्की के जरिए उत्तरी इराक के लिए एक वैकल्पिक मार्ग भी तैयार किया गया है.
स्वेज नहर से दूरी बढ़ी
लाल सागर क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम बढ़ने के बाद जहाजों ने बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य और स्वेज नहर के रास्ते से दूरी बनानी शुरू कर दी है. अब अधिकतर जहाज अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते यूरोप जा रहे हैं, जिससे यात्रा लंबी हो गई है.
लागत और समय पर असर
इस बदलाव का असर वैश्विक सप्लाई चेन पर साफ दिख रहा है. एशिया से यूरोप तक सामान पहुंचने में अब करीब दो हफ्ते ज्यादा लग रहे हैं. साथ ही ईंधन की खपत और जहाजों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे शिपिंग लागत में इजाफा हुआ है.
अफ्रीका पर होगी नोटों की बारिश!
अब इस बदलाव का सीधा प्रभाव विश्व स्तरीय व्यापार पर पड़ेगा. 'ड्रूरी फ्रेट इंडेक्स' के अनुसार, पिछले साल की तुलना में 40-फुट कंटेनर की शिपिंग लागत में अप्रैल में करीब 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. जहां अफ्रीका के कुछ बंदरगाहों में गतिविधियां तेज हुई हैं, वहीं मिस्र को नुकसान उठाना पड़ा है. स्वेज नहर से होने वाली आय में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो इस बदलाव के व्यापक आर्थिक असर को दर्शाता है.