आखिर कब तक टिक पाएगा ईरान? अमेरिकी ब्लॉकेड के बावजूद कमाई जारी; इस्लामाबाद वार्ता से पहले बड़ा सवाल
अमेरिकी नेवल ब्लॉकेड से ईरान पर दबाव बढ़ा है, लेकिन तेल भंडारण, समुद्री सप्लाई और होर्मुज स्ट्रेट से टोल वसूली के कारण वह अभी टिके रहने की स्थिति में है.
नई दिल्ली: अमेरिकी नेवल ब्लॉकेड के बाद ईरान पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ईरान इतनी जल्दी झुक जाएगा. आज इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता होनी है, जहां सबसे बड़ा मुद्दा होर्मुज स्ट्रेट और ईरान के संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम को लेकर रहेगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए ब्लॉकेड से तेहरान को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है. ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान को रोजाना लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है. हालांकि जमीनी हालात इससे थोड़े अलग नजर आ रहे हैं.
क्या है वजह?
होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है. अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों को घेरकर उसके तेल कारोबार को रोकने की कोशिश की है. इसके जवाब में ईरान ने भी इस मार्ग पर नियंत्रण सख्त कर दिया और कई जहाजों की आवाजाही पर नजर बढ़ा दी.
तेल की कीमतें पर क्या पड़ा असर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, जंग के शुरुआती हफ्तों में तेल की कीमतें बढ़ने से ईरान की कमाई में गिरावट नहीं बल्कि बढ़ोतरी हुई. हाल के हफ्तों में ईरान रोज करीब 20 लाख बैरल तेल बेच रहा था और सिर्फ एक महीने में लगभग 5 अरब डॉलर की कमाई हुई.
ईरान के पास क्या-क्या हैं मौजूदा विकल्प?
विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल ईरान के पास जमीन और समुद्र दोनों जगह तेल स्टोर करने की क्षमता है. कई टैंकरों में पहले से तेल भरा हुआ है. अनुमान है कि 160 से 180 मिलियन बैरल तेल समुद्र में अलग-अलग जगहों पर डिलीवरी का इंतजार कर रहा है. इससे ईरान करीब चार महीने तक अपनी कमाई जारी रख सकता है.
ब्लॉकेड के बावजूद ईरानी टैंकर रात के समय सिग्नल बंद करके बंदरगाहों से निकल रहे हैं और होर्मुज पार कर रहे हैं. इससे तेल सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हुई है. यही कारण है कि अमेरिका की रणनीति अभी पूरी तरह सफल नहीं मानी जा रही.
एक जहाज से कितनी ली जा रही फीस?
ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूली भी शुरू कर दी है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक एक जहाज से लाखों डॉलर तक की फीस ली जा रही है. इससे ईरान को अतिरिक्त कमाई का रास्ता मिल रहा है.
दूसरी ओर अमेरिका पर भी दबाव बढ़ रहा है. तेल की बढ़ती कीमतों से सहयोगी देश परेशान हैं. चीन और कई यूरोपीय देश भी लंबे ब्लॉकेड के पक्ष में नहीं दिख रहे. ऐसे में इस्लामाबाद वार्ता बेहद अहम मानी जा रही है.