नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के सामने शुरुआत से ही मुश्किलें खड़ी हो गई हैं. सरकार बने अभी एक महीना भी नहीं हुआ है, लेकिन हालात तेजी से बदल रहे हैं. दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा है, जिससे नेपाल सरकार पर दबाव बढ़ गया है. राजनीतिक अस्थिरता की चर्चा तेज हो गई है. यह स्थिति उनके नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा बन गई है.
ईरान से जुड़े हालात का असर नेपाल पर भी पड़ा है. ईंधन सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है, जिससे ऊर्जा संकट की स्थिति बन रही है. इससे आम लोगों पर असर पड़ रहा है. सरकार पर समाधान निकालने का दबाव है. आर्थिक हालात भी प्रभावित हो सकते हैं. यह चुनौती और गंभीर बनती जा रही है.
नेपाल इस समय वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है. भारत, चीन और अमेरिका तीनों की नजर यहां है. हर देश अपनी रणनीति के हिसाब से नेपाल को देख रहा है. नई सरकार की नीति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. यही वजह है कि काठमांडू में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है.
अमेरिका ने अपने अधिकारी को नेपाल भेजा. इसका मकसद नेपाल की दिशा को समझना था. इसके बाद चीन भी सक्रिय हो गया. उसने भी अपने प्रतिनिधि काठमांडू भेज दिए. दोनों देशों की बढ़ती सक्रियता साफ दिख रही है. इससे नेपाल पर दबाव और बढ़ गया है, हालात और जटिल होते जा रहे हैं.
प्रधानमंत्री बालेन शाह भारत दौरे की तैयारी में हैं. यह उनकी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा होगी. इस दौरान उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होगी. यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है. इससे नेपाल की विदेश नीति का संकेत मिल सकता है. भारत के साथ रिश्तों पर सबकी नजर है.
नेपाल की विदेश नीति इस समय सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है. नई सरकार को संतुलन बनाना होगा. किसी एक तरफ झुकाव बड़ा असर डाल सकता है. तीनों देशों के बीच संतुलन जरूरी है. यह काम आसान नहीं है हर कदम सोच समझकर उठाना होगा। यही असली चुनौती है.
अब सबकी नजर आगे के फैसलों पर है. सरकार कौन सा रास्ता चुनती है. यह देखना अहम होगा. कूटनीतिक दबाव लगातार बना हुआ है. आने वाले दिन निर्णायक हो सकते हैं. बालेन शाह की रणनीति ही नेपाल का भविष्य तय करेगी. यही वजह है कि यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.