नई दिल्ली: संसद का विशेष सत्र शुरू होते ही सरकार ने तीन अहम बिल पेश कर दिए हैं, जो देश की चुनावी व्यवस्था को पूरी तरह बदल सकते हैं. इनमें सबसे चर्चित है परिसीमन विधेयक-2026. सरकार का कहना है कि 1971 की जनगणना के आधार पर तय सीटों का फॉर्मूला अब पुराना हो चुका है. इसलिए 2011 की जनगणना के आधार पर नया परिसीमन किया जाएगा, जिससे लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर करीब 850 हो जाएंगी. साथ ही 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू करने का रास्ता भी साफ हो जाएगा.
परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं और संख्या तय करना या बदलना. यानी लोकसभा और विधानसभा की सीटों का बंटवारा जनसंख्या के हिसाब से करना. अभी लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर तय हैं. पिछले कई दशकों में देश की आबादी बहुत बढ़ गई है, खासकर उत्तर भारत में. इसलिए सरकार चाहती है कि नई जनगणना के आधार पर सीटों का नया बंटवारा हो, ताकि हर क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व मिल सके. परिसीमन आयोग बनाकर यह काम किया जाएगा.
सरकार तीन बिल लाई है. पहला संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जो 1971 की जनगणना की जगह 2011 की जनगणना को आधार बनाने का रास्ता खोलेगा. दूसरा परिसीमन विधेयक-2026, जिसके तहत नया आयोग बनेगा और सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान है. तीसरा संघ राज्य क्षेत्र कानून संशोधन विधेयक, जो केंद्र शासित प्रदेशों की सीटों को भी समायोजित करेगा. सरकार का लक्ष्य है कि महिला आरक्षण 2029 के चुनाव से पहले लागू हो जाए और सीटों का बंटवारा वर्तमान जनसंख्या के अनुसार हो.
विपक्ष, खासकर दक्षिण भारतीय दलों जैसे द्रमुक का कहना है कि नया परिसीमन दक्षिण के राज्यों के साथ अन्याय होगा. दक्षिण के राज्य (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं, जबकि उत्तर के राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है. ऐसे में नई जनगणना के आधार पर उत्तर के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलेंगी और दक्षिण की राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी. विपक्ष इसे संघीय ढांचे पर हमला बता रहा है और 2021 की जनगणना का इंतजार करने की मांग कर रहा है.
यदि ये बिल पास हो गए तो 2029 के लोकसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर होंगे. लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 हो जाएंगी और महिला आरक्षण भी लागू हो जाएगा. इससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव देश की चुनावी राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करेगा. फिलहाल संसद में इस मुद्दे पर तीखी बहस होने वाली है.