जब बिना बहुमत के येदियुरप्पा ने बना ली थी सरकार तो विजय को मना क्यों? सवालों के घेरे में राज्यपाल
तमिलनाडु चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी सरकार बनाने में विजय को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. राज्यपाल ने उन्हें मंजूरी नहीं दी है. इसी को लेकर 2018 के कर्नाटक मामले को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है.
चेन्नई: हाल में पांच राज्यों में हुए चुनावों के बाद पूरे देश में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है. एक्टिंग से राजनीति में आए थलपति विजय की पार्टी टीवीके ने तमिलनाडु में शानदार प्रदर्शन किया है और 108 सीटों पर जीत दर्ज कर स्टेट की सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है. इसके बाद भी उन्हें सरकार बनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करने के बाद भी उन्हें बहुमत न होने के कारण मंजूरी नहीं मिली है. ऐसे में 2018 के कर्नाटक मामले को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है. और राज्यपाल की भूमिका पर सवालिया निशान लग रहे हैं.
2018 में कर्नाटक में येदियुरप्पा को मिला था मौका
दरअसल 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. हालांकि बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत से फिर भी दूर थी. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाने का दावा भी पेश किया था. इसके बावजूद तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया था. उनसे शपथ से पहले बहुमत साबित करने वाले विधायकों की सूची नहीं मांगी गई थी.
दोनों मामलों की हो रही तुलना
अब जब विजय को सरकार बनानी की मंजूरी नहीं मिल रही है तब तमिलनाडु और कर्नाटक के दोनों मामलों की तुलना हो रही है और राजनीतिक दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. विपक्षी नेताओं का कहना है कि येदियुरप्पा को पहले शपथ दिलाई गई और बाद में फ्लोर टेस्ट का मौका दिया गया था जबकि विजय के मामले में पहले ही समर्थन पत्र मांगे जा रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि यह सब संवैधानिक प्रक्रिया में अलग-अलग मानदंड अपनाने जैसा दिखाई दे रहा है. इस मुद्दे ने एक बार फिर राज्यपाल की निष्पक्षता को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों को लेकर क्या कहा?
वहीं देश का सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामलों को लेकर पहले भी साफ कर चुका है कि बहुमत का फैसला विधानसभा के फ्लोर पर होना चाहिए न कि राजभवन के भीतर. 1994 के ऐतिहासिक एसआर बोम्मई फैसले में अदालत ने कहा था कि लोकतंत्र में सरकार का बहुमत सदन में ही साबित होना चाहिए. वहीं विजय के समर्थकों का भी यह कहना है कि यही नियम तमिलनाडु में भी लागू होना चाहिए. उनका मानना है कि अगर सरकार बनाने का दावा पेश किया गया है तो अंतिम फैसला फ्लोर टेस्ट के जरिए होना चाहिए.
अभी क्या है तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की स्थिति
तमिलनाडु विधानसभा 234 सीटों की है, जिसमें टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है. हालांकि कांग्रेस ने विजय को समर्थन दिया है इसके बाद भी विजय का आंकड़ा बहुमत से कुछ सीटें कम है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विजय अब छोटे दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकते हैं. अगर उन्हें अतिरिक्त समर्थन मिल जाता है तो सरकार गठन का रास्ता साफ हो सकता है. वहीं समर्थन नहीं मिलने की स्थिति में मामला कानूनी और संवैधानिक विवाद का रूप भी ले सकता है.