menu-icon
India Daily

बांग्लादेश में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियों पर भारत की पैनी नजर, क्या बीएनपी के कार्यकाल में सुधरेंगे दोनों देशों के संबंध

यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं चरम पर पहुंच गईं. जनवरी 2026 में 118 संयुक्त सचिवों को पद्दोनति सूचि से जानबूझकर हिंदू अधिकारियों को बाहर रखा गया. वहां हिंदू विरोधी और भारत विरोधी भावना भी बढ़ीं.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
बांग्लादेश में सत्ता हस्तांतरण की तैयारियों पर भारत की पैनी नजर, क्या बीएनपी के कार्यकाल में सुधरेंगे दोनों देशों के संबंध
Courtesy: pinterest

बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चुनाव जीतने के बाद सब सारी नजरें सत्ता हस्तांतरण पर टिक गई हैं क्योंकि मोहम्मद यूनुस तारिक रहमान को सत्ता सौंपने की तैयारी कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, ऐसी अटकलें हैं कि नोबेल पुरस्कार विजेता को औपचारिक अध्यक्ष पद या सलाहकार की भूमिका की पेशकश की जा सकती है जबकि कुछ का मानना है कि उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का उपयोग गैर-कार्यकारी क्षमता में किया जाना चाहिए.

60 वर्षीय रहमान, चुनावों में बीएनपी की एतिहासिक जीत के बाद 35 वर्षों में देश के पहले पुरुष राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. कैबिनेट सचिव डॉ. शेख अब्दुर राशिद ने कहा कि नव निर्वाचित सांसद 17 फरवरी को शपथ ग्रहण करेंगे.

भारत के लिए अच्छा नहीं रहा मोहम्मद यूनुस का कार्यकाल

दिल्ली बांग्लादेश में हो रहे घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रख रही है क्योंकि बांग्लादेश अब यूनुस के बाद के चरण में कदम रखने जा रहा है. शीर्ष सूत्रों के मुताबिक, नई दिल्ली बीएनपी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने के लिए तैयार है.

यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं चरम पर पहुंच गईं. जनवरी 2026 में 118 संयुक्त सचिवों को पद्दोनति सूचि से जानबूझकर हिंदू अधिकारियों को बाहर रखा गया. वहां हिंदू विरोधी और भारत विरोधी भावना भी बढ़ीं.

मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में ढाका और इस्लामाबाद के बीच संबंधों में काफी सुधार आया जिसमें 2025 में चार उच्च स्तरीय सैन्य दौरे और वीजा नियमों में ढील शामिल है. ऐसी भी खबरें आईं कि क्षेत्र में संभावित हथियार तस्करी और कट्टरपंथी संगठनों के फिर से संगठित होने की खबरों के बीच भारतीय एजेंसियों ने इस घटनाक्रमों की गहन जांच की.

कई कार्य नहीं थे लोकतांत्रिक

सूत्रों के अनुसार, यूनुस को सुचारू और शीघ्र पद छोड़ने के दबाव का सामना करना पड़ रहा है. कई लोकतांत्रिक दलों का तर्क है कि यद्यपि उनका कार्यकाल सत्ता परिवर्तन की देखरेख के लिए थे लेकिन उनके कई कार्य लोकतांत्रिक नहीं थे. जमात प्रमुख सहित कई बांग्लादेशी नेताओं ने कथित तौर पर कहा कि उनकी भूमिका केवल संक्रमणकालीन थी.

मौलिक बदलाव आने की उम्मीद नहीं

अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि यूनुस के जाने से भारत-बांग्लादेश संबंधों में कोई मौलिक बदलाव नहीं आएगा. नई दिल्ली को उम्मीद है की बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार अंतरिम चरण में लिए गए कुछ रणनीतिक निर्णयों पर पुनर्विचार करेगी और अल्पसंख्यकों की चिंताओं को दूर करने के लिए कदम उठाएगी.

सूत्रों के अनुसार, यूनुस ने कठिन आर्थिक दौर में बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर करने में कामयाबी हासिल की, हालांकि मुद्रास्फीति कथित तौर पर 9% के आसपास बनी रही. उनके कार्यकाल में युवा बेरोजगारी का स्तर ऊंचा रहा और वस्त्र क्षेत्र जो देश के निर्यात का लगभग 80% हिस्सा है, को व्यवधान का सामना करना पड़ा.