नई दिल्ली: कैंसर के इलाज को लेकर दुनियाभर में लगातार नई तकनीकों पर काम हो रहा है और अब भारत में भी फेफड़ों के कैंसर के मरीजों के लिए एक बड़ी राहत सामने आई है. हाल ही में एक नई इम्यूनोथेरेपी इंजेक्शन लॉन्च की गई है, जिसकी सबसे खास बात यह है कि इसे महज 7 मिनट में शरीर में दिया जा सकता है. पहले यही इलाज लंबे समय तक चलने वाले IV इन्फ्यूजन के जरिए किया जाता था, जिसमें मरीजों को घंटों अस्पताल में रहना पड़ता था. नई तकनीक ने इलाज को तेज, आसान और ज्यादा सुविधाजनक बना दिया है.
यह नई दवा खासतौर पर नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) के मरीजों के लिए लाई गई है. भारत में हर साल बड़ी संख्या में फेफड़ों के कैंसर के मामले सामने आते हैं और इनमें सबसे ज्यादा मरीज इसी प्रकार के कैंसर से प्रभावित होते हैं. हालांकि यह इलाज हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं माना जा रहा, क्योंकि इसका असर उन लोगों पर ज्यादा होता है जिनके कैंसर सेल्स में PD-L1 प्रोटीन का स्तर ज्यादा होता है.
अब सवाल यह है कि ये दवा काम कैसे करती है. तो हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम में मौजूद T-Cells बीमारी पैदा करने वाली कोशिकाओं पर हमला करते हैं. लेकिन कई कैंसर सेल्स अपने ऊपर PD-L1 नाम का प्रोटीन विकसित कर लेते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम भ्रमित हो जाता है और कैंसर पर हमला नहीं कर पाता.
नई इम्यूनोथेरेपी दवा एटेजोलिज़ुमैब इस PD-L1 प्रोटीन को ब्लॉक करती है. इससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली फिर से सक्रिय होकर कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और खत्म करने लगती है.
पहले मरीजों को यह दवा IV इन्फ्यूजन के जरिए दी जाती थी, जिसमें काफी समय लगता था. नई सबक्यूटेनियस (SC) इंजेक्शन तकनीक में इसे सीधे जांघ में इंजेक्ट किया जाता है और पूरी प्रक्रिया लगभग 7 मिनट में पूरी हो जाती है.
इससे अस्पतालों पर बोझ भी कम होगा और मरीजों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि जहां पहले एक मरीज के इलाज में घंटों लगते थे, वहीं अब उसी समय में कई मरीजों का इलाज संभव हो सकेगा.
इस नई इम्यूनोथेरेपी इंजेक्शन की कीमत काफी ज्यादा है. भारत में इसकी एक डोज का खर्च करीब 3.7 लाख रुपये बताया जा रहा है और सामान्य तौर पर मरीज को करीब 6 डोज की जरूरत पड़ सकती है.
हालांकि कुछ पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम मरीजों की आर्थिक मदद कर रहे हैं. इसके अलावा इसे CGHS जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में भी शामिल किया गया है, जिससे योग्य मरीजों को राहत मिल सकती है.