टैगोर की धरती पर खूनी राजनीतिः सत्ता बदली पर नहीं बदले हालात, चंद्रनाथ रथ हत्याकांड ने फिर उठाए बड़े सवाल
बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ हत्याकांड ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. जानिए रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद के विचारों के संदर्भ में बंगाल की बदलती राजनीति और भय के माहौल का विश्लेषण.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत को “महामानव समुद्र” कहा था. एक ऐसा देश जहां विभिन्न जातियां, संस्कृतियां और भाषाएं आकर एक- दूसरे में समाहित होती रहीं. लेकिन उसी बंगाल की धरती आज फिर राजनीतिक हिंसा के रक्त रंजित अध्याय की गवाह बन रही है. बीजेपी विधायक सुवेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की उत्तरी 24 परगना में हुई नृशंस हत्या ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
राजनीतिक हिंसा बंगाल की पहचान बनती चली गई
बंगाल की पहचान कभी कला, साहित्य, अध्यात्म और सामाजिक जागरण की धरती के रूप में रही. रवींद्रनाथ टैगोर स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय सुभाष चंद्र बोस और सत्यजीत राय जैसी महान विभूतियों ने दुनिया को मानवता, राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता का संदेश दिया. लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक हिंसा भी धीरे- धीरे बंगाल की स्थाई पहचान बनती चली गई.
समय बदला, लेकिन हिंसा नहीं थमी
पश्चिम बंगाल पिछले करीब चार दशकों से कई राजनीतिक परिवर्तन हुए. 1977 से 2011 तक वाम मोर्चा और सीपीएम का लंबा शासन रहा. ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासन के दौरान राजनीतिक हिंसा के कई आरोप लगे. साल 2011 में ममता बनर्जी ने एहिहासिक जीत दर्ज कर सत्ता बदली, लेकिन हिंसा का दौर नही थमा.
अब 2026 में बीजेपी सत्ता में आने के बाद भी हालात पूरी तरह नहीं बदले हैं. चुनाव प्रचार और मतगणना के दौरान सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रही, लेकिन राजनीतिक प्रतिशोध और भय का माहौल अब भी खत्म नहीं हुआ. फर्क सिर्फ इतना है कि सत्ता बदलने के साथ भय का केंद्र बदल गया है.
चंद्रनाथ हत्याकांड ने फिर कुरेदे पुराने जख्म
भवानीपुर से बीजेपी विधायक सुवेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की हत्या को राजनीतिक गलियारों में बेहद संवेदनशील माना जा रहा है. इस वारदात ने बंगाल के उस रक्तचरित्र का फिर उजागर कर दिया है, जिसकी चर्चा दशकों से होती रही है. राजनीतिक विश्र्लेषकों का मानना है कि बंगाल में चुनाव सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार वे शक्ति प्रदर्शन और प्रतिशोध की लड़ाई में बदल जाते हैं. यही वजह है कि आम जनता के भीतर भय और असुरक्षा की भावना लगातार बनी रहती है.
टैगोर का भयमुक्त भारत का सपना आज भी अधूरा?
रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने संदेश में कहा था- जहां मन भयमुक्त हो और सिर ऊंचा रहे... मेरे देश को स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में जाग्रत करो. टैगोर का यह संदेश सिर्फ अंगेजों के दमन के खिलाफ नहीं था, बल्कि हर प्रकार की हिंसा, भय और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ था. उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को मानवता, सामाजिक एकता और सामाजिक समरसता से जोड़कर देखा. टैगोर को मानना था कि भारत की आत्मा उसकी विविधता और सह- अस्तित्व में बसती है.
बंगाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आज पश्चिम बंगाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि भय और हिंसा की राजनीति से बाहर निकलने की है. सवाल है कि क्या बंगाल फिर से टैगोर और स्वामी विवेकानंद की उस विचारधारा की ओर लौट पाएगा, जहां सामाजिक एकता, सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक संवाद सर्वोपरि हो? चंद्रनाथ रथ हत्याकांड ने यह बहस एक बार फिर तेज कर दी है.