जेल से बाहर आया निठारी कांड का आरोपी सुरेंद्र कोली, दो बार होते-होते रह गई थी फांसी

2006 के चर्चित निठारी कांड में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि सबूत अपर्याप्त हैं. कोली के वकील ने फैसले को न्याय व्यवस्था की खामियों को उजागर करने वाला बताया.

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Kuldeep Sharma

नोयडा: निठारी हत्याकांड में आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सुरेंद्र कोली को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. यह फैसला 13 मामलों में अंतिम सुनवाई के बाद आया, जिसमें कोली ने अपनी सजा के खिलाफ क्युरेटिव याचिका दाखिल की थी. 

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत और विक्रम नाथ की बेंच ने आदेश दिया कि 'कोली की सजा, जुर्माना और दोष सिद्धि रद्द की जाती है और उसे तुरंत रिहा किया जाए, यदि किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो.'

'दो बार फांसी के मुंह तक गया'

कोली की वकील पायोशी रॉय ने फैसले को ऐतिहासिक बताया और कहा कि यह मामला भारत की न्यायिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है. उन्होंने कहा, 'यह केस दिखाता है कि कैसे एक गरीब व्यक्ति को झूठे सबूतों और सनसनीखेज आरोपों के जरिए फंसाया जा सकता है. कोली को दो बार लगभग फांसी दी जाने वाली थी.' रॉय ने कहा कि यह फैसला भारत में मृत्युदंड पर पुनर्विचार का अवसर है.

 

कब और कैसे फंसे थे

सुरेंद्र कोली

कोली को 2006 में निठारी गांव, नोएडा में हुई सिलसिलेवार हत्याओं के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन पर एक 15 वर्षीय लड़की के साथ रेप और हत्या का आरोप था. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा था. 2014 में उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई थी, लेकिन 2015 में दया याचिका पर देरी के चलते इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया था.

अदालत ने बताई सबूतों में कमी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोली की सजा मुख्य रूप से एक बयान और रसोई के चाकू की बरामदगी पर आधारित थी, जो पर्याप्त नहीं थी. अदालत ने टिप्पणी की कि 'सबूत इतने ठोस नहीं हैं कि किसी को मृत्युदंड दिया जा सके.' अदालत ने यह भी कहा कि जांच एजेंसियों को भविष्य में ऐसे मामलों में सतर्क रहना होगा ताकि निर्दोष व्यक्ति सजा न भुगते.

क्या था निठारी कांड

निठारी कांड 29 दिसंबर 2006 को सामने आया था, जब नोएडा सेक्टर-31 स्थित मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे नाले से आठ बच्चों के कंकाल बरामद हुए. आगे की तलाशी में और भी हड्डियां, खोपड़ियां और शवों के अवशेष मिले, जिनमें अधिकांश गरीब परिवारों के लापता बच्चे और महिलाएं थीं. सुरेंद्र कोली, पंढेर के घर पर घरेलू नौकर था, जिस पर इन हत्याओं को अंजाम देने का आरोप लगा था.

न्याय व्यवस्था पर उठे सवाल

यह फैसला न्याय व्यवस्था में व्याप्त असमानताओं पर गंभीर सवाल उठाता है. वकील रॉय ने कहा, 'अगर कोली को फांसी दे दी जाती, तो शायद हम उसकी बेगुनाही कभी नहीं जान पाते. यह फैसला बताता है कि हाशिए पर खड़े लोग सिस्टम में कितने असुरक्षित हैं.'