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कौन है एनकाउंटर में मारा गया एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली अनल दा? 30 साल से फैला रहा लाल 'आतंक', जानें पूरी कुंडली

अनल दा 1987 से नक्सली गतिविधियों में सक्रिय था और झारखंड-बिहार के कई जिलों में अपना दबदबा कायम कर चुका था. 1987 से 2000 तक अनल दा ने गोपाल दा के नाम से पीरटांड़, टुंडी और तोपचांद इलाकों में काम किया.

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रांची: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल में सुरक्षाबलों और भाकपा (माओवादी) नक्सलियों के बीच गुरुवार को भीषण मुठभेड़ हुई. इस एनकाउंटर में एक करोड़ रुपये का इनामी कुख्यात नक्सली नेता अनल दा सहित कई माओवादी मारे गए. यह झारखंड में पिछले कई सालों का सबसे बड़ा एंटी-नक्सल ऑपरेशन माना जा रहा है. 

कौन है एनकाउंटर में मारा गया खूंखार नक्सली अनल दा?

अनल दा उर्फ तूफान, पतिराम मांझी, पतिराम मरांडी और रमेश के नाम से भी जाना जाता था. वह गिरिडीह जिले के पीरटांड़ थाना क्षेत्र का रहने वाला था और भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी (सीसीएम) का प्रमुख सदस्य था. संगठन में उसे रणनीतिकार के रूप में जाना जाता था. अनल दा 1987 से नक्सली गतिविधियों में सक्रिय था और झारखंड-बिहार के कई जिलों में अपना दबदबा कायम कर चुका था. 1987 से 2000 तक अनल दा ने गोपाल दा के नाम से पीरटांड़, टुंडी और तोपचांद इलाकों में काम किया.

झारखंड-बिहार के कई जिलों में अपना कायम कर चुका था आतंक

इस दौरान नक्सली संगठन ने इन क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाई और कई हमलों को अंजाम दिया. स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों में दहशत फैल गई थी. साल 2000 के आसपास उसे जमुई (बिहार) भेजा गया, जहां वह एक बार गिरफ्तार हुआ. जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद उसने फिर से गतिविधियां शुरू कीं. जमानत के बाद अनल दा ने रांची और गुमला जिलों की कमान संभाली. उसके रणनीतिक कौशल के कारण संगठन में उसका प्रभाव बढ़ा और उसे केंद्रीय कमेटी में शामिल किया गया.

अनल दा के साथ 10 से 16 तक माओवादी

लंबे समय से वह सुरक्षाबलों के रडार पर था और मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल था. यह मुठभेड़ कोबरा-209 बटालियन, सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस की संयुक्त टीम ने की. रिपोर्ट्स के अनुसार अनल दा के साथ 10 से 16 तक माओवादी ढेर हुए. इलाके में सर्च ऑपरेशन जारी है और हथियारों-विस्फोटकों की बरामदगी भी हो रही है. यह सफलता नक्सलवाद के खिलाफ राज्य सरकार और केंद्र की नीतियों की बड़ी जीत है. सारंडा जैसे घने जंगलों में नक्सलियों का सफाया होना सुरक्षा बलों की बढ़ती क्षमता को दिखाता है. अब सुरक्षा बलों का फोकस बाकी टॉप लीडर्स पर है.