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पराली नहीं है दिल्ली प्रदूषण की असली वजह, नई स्टडी में हुआ हैरान कर देने वाला खुलासा

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की नई स्टडी बताती है कि दिल्ली की जहरीली हवा में पराली का योगदान बेहद कम रहा. प्रदूषण का मुख्य कारण ट्रैफिक, स्थानीय उत्सर्जन और सर्दियों की स्थिर हवा है, जिसने हालात बिगाड़ दिए.

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Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: दिल्ली इस साल फिर जहरीली हवा की गिरफ्त में रही, जबकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं कई सालों की तुलना में काफी कम रहीं. 

इसके बावजूद अक्टूबर और नवंबर में राजधानी का AQI लगातार ‘बेहद खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी में बना रहा. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की नई स्टडी ने साफ किया है कि प्रदूषण के लिए बाहरी कारकों से ज्यादा दिल्ली के भीतर का ट्रैफिक, औद्योगिक गतिविधियां और स्थानीय स्रोत जिम्मेदार हैं, जिनके कारण हवा में जहरीले तत्व बढ़ते गए.

ट्रैफिक बना सबसे बड़ा प्रदूषण स्रोत

स्टडी कहती है कि दिल्ली के अधिकतर इलाकों में पीक ट्रैफिक के दौरान हवा सबसे ज्यादा खराब होती दिखी. सुबह 7 से 10 बजे और शाम 6 से 9 बजे PM2.5 और NO₂ एक साथ बढ़े. शोधकर्ताओं के अनुसार, सर्दियों में हवा नीचे दब जाती है, जिससे वाहनों का धुआं ऊपर नहीं उठ पाता. नतीजतन, हर दिन हवा में जहरीले तत्वों की परत बनती चली जाती है और शहर स्मॉग की चादर में ढंक जाता है.

पराली का योगदान 5% से भी कम

रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार ज्यादातर दिनों में पराली के धुएं का हिस्सा 5% से नीचे रहा. केवल 12-13 नवंबर को यह 22% तक पहुंचा, लेकिन इसके अलावा पूरा महीना स्थानीय प्रदूषण ही हावी रहा. इससे साबित होता है कि पराली जलाने की घटनाएं कम होने के बावजूद दिल्ली की हवा में किसी तरह का बड़ा सुधार नहीं आया. अक्टूबर और नवंबर में लगभग हर दिन AQI ‘बेहद खराब’ या ‘गंभीर’ पर अटका रहा.

सबसे ज्यादा प्रदूषित हॉटस्पॉट पहचान में आए

दिल्ली के 22 प्रदूषण स्टेशनों की जांच में कई इलाके गंभीर हॉटस्पॉट के रूप में सामने आए. जहांगीरपुरी में सालाना PM2.5 औसत 119 µg/m³ दर्ज हुआ, जो सबसे अधिक है. इसके बाद बवाना-वजीरपुर 113 µg/m³ और आनंद विहार 111 µg/m³ पर रहे. द्वारका सेक्टर-8, विवेक विहार, अलीपुर और नेहरू नगर में भी CO और PM स्तर लगातार सीमा से ऊपर मिले. कई जगह 30 से 55 दिनों तक CO मानक से अधिक रही.

प्रदूषण में गिरावट 2020 के बाद रुकी

रिपोर्ट चेताती है कि दिल्ली में 2018 से 2020 के बीच जो गिरावट दिख रही थी, वह अब थम गई है. 2024 में सालाना PM2.5 बढ़कर फिर 104.7 µg/m³ हो गया. विशेषज्ञों का कहना है कि साफ हवा के लिए सिर्फ सीजनल उपाय काफी नहीं हैं. जब तक ट्रैफिक, ईंधन उपयोग, कचरा प्रबंधन और औद्योगिक उत्सर्जन पर कठोर नियंत्रण नहीं होगा, दिल्ली हर साल सर्दियों में प्रदूषण की मार झेलती रहेगी.

सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ईंधन की जरूरत

CSE ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए कई सुझाव दिए हैं. पुरानी गाड़ियों का तेज स्क्रैपेज, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी में सुधार, साइकिल ट्रैक का विस्तार और पार्किंग कैप. उद्योगों में कोयले की जगह स्वच्छ ईंधन अपनाने, खुले में कचरा जलाने पर सख्त रोक और घरों में साफ ईंधन उपलब्ध कराने जैसे कदम भी जरूरी बताए गए. स्टडी कहती है कि ठोस नीतियों के बिना दिल्ली की हवा बेहतर नहीं हो सकती.