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नौकरी और पैसे के लालच से धर्मांतरण समाज के लिए खतरा, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हाल ही में धर्मांतरण को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसने राज्य ही नहीं बल्कि देशभर में सामाजिक और संवैधानिक बहस को नया आयाम दिया है.

Credit: Law Trend
Anubhaw Mani Tripathi

छत्तीसगढ़: आए दिन धर्मांतरण की खबरें सामने आती रहती हैं, जिसको देखते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. इस टिप्पणी ने देश भर में सामाजिक और संवैधानिक बहस को एक नया आयाम दिया है. इस मामले में, न्यायालय ने कहा कि आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों, विशेषकर आदिवासी समुदायों द्वारा धन, नौकरी, शिक्षा या बेहतर जीवन के लिए धर्मांतरण की प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक खतरा बनती जा रही है.

गांव में लगाए जा रहे होर्डिंग

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिनमें ईसाई मिशनरियों के खिलाफ आरोप लगाए गए थे कि वे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रहे हैं. अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि कांकेर जिले के कम से कम आठ गांवों में ऐसे होर्डिंग लगाए गए हैं, जिन पर लिखा कि गांव में पादरियों और धर्मांतरण कर चुके ईसाइयों का प्रवेश वर्जित है.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था और धर्म चुनने की आज़ादी देता है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता प्रलोभन, दबाव या धोखे के माध्यम से प्रयोग की जाती है, तब यह न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक रूप से भी खतरनाक हो जाती है. अदालत ने यह भी कहा कि समय के साथ “मिशनरी गतिविधियां” सेवा के नाम पर धर्मांतरण का माध्यम बन गई हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

पीठ ने कहा, “आर्थिक रूप से कमजोर और अशिक्षित आदिवासी परिवारों को मुफ्त शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं या आर्थिक सहायता का लालच देकर धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जाता है. यह स्वैच्छिक आस्था का नहीं बल्कि असुरक्षा और हेरफेर का परिणाम होता है.” अदालत ने इस प्रवृत्ति को सांस्कृतिक दबाव के समान बताया, जो आदिवासी समुदायों में सामाजिक विभाजन और अलगाव को जन्म देती है.

धर्मांतरण सेवा की भावना के बजाय विस्तार का माध्यम बन जाए

न्यायालय ने कहा कि धर्मांतरण से न केवल आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान प्रभावित होती है, बल्कि उनकी परंपराएं, भाषाएं और प्रथागत कानून भी खतरे में पड़ जाते हैं. अदालत के अनुसार, “धर्मांतरण इस प्राकृतिक संबंध को तोड़ देता है जो आदिवासी समुदायों को उनकी जड़ों से जोड़ता है. इसके परिणामस्वरूप कई नए धर्मांतरित व्यक्तियों को अपने ही समाज से बहिष्कार और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है.”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस समस्या का समाधान असहिष्णुता में नहीं, बल्कि इस बात को सुनिश्चित करने में है कि धर्म परिवर्तन केवल व्यक्तिगत आस्था और दृढ़ विश्वास का विषय रहे, किसी भी प्रकार के दबाव, प्रलोभन या असुरक्षा के कारण न हो. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की यह टिप्पणी भारत में धर्मांतरण से जुड़े चल रहे सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में एक अहम पड़ाव मानी जा रही है. अदालत ने साफ किया कि यदि धर्मांतरण सेवा की भावना के बजाय विस्तार का माध्यम बन जाए, तो यह देश की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकता है.