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आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की इलेक्टोरल बॉन्ड जांच की याचिका, SIT बनाने से किया इंकार

Electoral Bonds case: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चुनावी बॉन्डों के माध्यम से कॉर्पोरेट्स और राजनीतिक दलों के बीच कथित क्विड प्रो क्वो व्यवस्था की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की याचिकाओं को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के ऐसा करने के पीछे का क्या कारण है, आइए इस पर एक नजर डालते हैं-

India Daily Live

Electoral Bonds case: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चुनावी बॉन्डों के माध्यम से कॉर्पोरेट्स और राजनीतिक दलों के बीच कथित लेन-देन की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की याचिकाओं को खारिज कर दिया.  याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चुनावी बॉन्डों के माध्यम से राजनीतिक दलों को बड़े-बड़े दान देने के बदले में ठेके दिलाए गए हैं.

तो इस वजह से CJI ने रद्द की याचिका

याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि एक रिटायर्ड  न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक SIT का गठन किया जाए ताकि चुनावी बॉन्डों के माध्यम से धन के लेन-देन और कथित लेन-देन की जांच की जा सके. हालांकि, चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत उचित उपाय कर सकते हैं.  यदि उनकी शिकायतों की जांच नहीं की जाती है या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो वे उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं. 

अदालत ने साफ  किया कि चुनावी बॉन्ड से संबंधित मामलों में न्यायिक समीक्षा का पहलू होने के कारण अदालत ने पहले याचिकाओं पर विचार किया था. लेकिन आपराधिक गलत काम से जुड़े मामलों में सामान्य कानून के तहत उपलब्ध उपायों को अपनाए जाने के बाद ही अनुच्छेद 32 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने योजना को बताया था कचरा

गौरतलब है कि फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को ही रद्द कर दिया था.  इस योजना की शुरुआत वर्ष 2017 में की गई थी और इसे बैंकिंग चैनलों के माध्यम से दान को बढ़ावा देने के रूप में पेश किया गया था.  हालांकि, आलोचकों ने इस योजना की आलोचना करते हुए कहा कि इससे दानदाताओं को गुमनामी मिलती है और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ जाती है.

बीजेपी को इलेक्टोरल बॉन्ड से मिला था सबसे ज्यादा चंदा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने मार्च में चुनावी बॉन्ड से संबंधित अतिरिक्त डेटा जारी किया था, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त धनराशि का विवरण और संबंधित बैंक खाता जानकारी शामिल थी. इस डेटा के अनुसार, भाजपा ने चुनावी बॉन्ड के माध्यम से सबसे अधिक 6,986.5 करोड़ रुपये प्राप्त किए, जिसमें से अधिकतम 2,555 करोड़ रुपये वर्ष 2019-20 में प्राप्त हुए थे.  इसके बाद तृणमूल कांग्रेस का नंबर आता है, जिसने 1,397 करोड़ रुपये प्राप्त किए. 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब देखना होगा कि याचिकाकर्ता आगे क्या कदम उठाते हैं.  हालांकि, यह फैसला राजनीतिक दलों के वित्त पोषण में ट्रांसपैरेंसी के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है.