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Electoral Bond: क्या होता है चुनावी बॉन्ड, कैसे करता है काम और क्यों सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती

Electoral Bond: आज सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की चुनौती वाली याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि 'इलेक्टोरल बॉन्ड सूचना के अधिकार का उल्लंघन' है.

Gyanendra Tiwari

Electoral Bond: चुनावी बांड को सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इसे अवैध करार देते हुए बॉन्ड की खरीद पर रोक लगा दी है. बीते साल 2 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय की CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने 3 दिन की सुनवाई करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था.

चुनाव आयोग ने पार्टियों को मिली फंडिंग का डाटा नहीं रखा था, जिसे लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भी जताई थी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ये इलेक्शन कमीशन से ये भी कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड के तहत राजनीतिक पार्टियों को कितना पैसा कहा से मिला इसकी जानकारी जल्द से जल्द दें. ऐसे में आज हम आपको इलेक्टोरल बॉन्ड क्या होता है, ये कैसे काम करता है और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है. आइए जानते हैं. 

क्या होता है इलेक्टोरल बॉन्ड?

इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए कोई भी व्यक्ति अपने मनमुताबिक किसी भी राजनीतिक दल को चंदा दे सकता है. इलेक्टोरल बॉन्ड एक तरह से राजनीतिक दलों को चंदा देने का जरिया है. यह एक ऐसा वचन पत्र होता है जिसे कोई भी कंपनी या नागरिक भारतीय स्टेट बैंक (State Bank Of India) की शाखाओं से लेकर किसी भी राजनीतिक दलों से अपनी पहचान छिपाकर गुमनाम तरीके से धनराशि चंदे के रूप में दे सकता है. 

2018 में कानूनी रूप से लागू हुआ 

केंद्र सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड की घोषणा साल 2017 में की थी. इसके बाद 29 जनवरी 2018 को सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड को कानूनी रूप से लागू भी कर दिया था. 

इलेक्टोरल बॉन्ड के तहत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया किसी भी राजनीतिक पार्टी को धन देने के लिए किसी व्यक्ति या कंपनी को एक बॉन्ड जारी कर सकता है. कोई भी 1 हजार से लेकर 1 करोड़ रुपए तक का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद सकता है. खरीदने वाले को अपनी डिटेल बैंक को देनी होती है. जिस पार्टी के लिए कोई व्यक्ति या कंपनी जिस पार्टी के लिए  बॉन्ड खरीद रहा या रही है उस पार्टी को पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1 फीसदी वोट मिला होना चाहिए. 

अगर किसी व्यक्ति ने राजनीतिक दल के नाम एक निश्चित राशि का बॉन्ड खरीद कर डोनेट कर दिया तो पार्टी को 15 दिन के अंदर ही उस बॉन्ड को चुनाव आयोग से वेरीफाई करा कर बॉन्ड के पैसे को कैश कराना होता है. 

2017 में जब तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इलेक्टोरल बॉन्ड को पेश किया था तो दावा किया था कि इससे चुनावी प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी आएगी. काले धन पर लगाम लगेगी. लेकिन इसका विरोध करने वालों ने तर्क दिया कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए जो चंदे के रूप में दान देता है उसकी पहचान उजागर नहीं की जाती. ऐसे में काले धन को सफेद करना आसान हो जाता है. 

2017 में ही दी गई चुनौती 

2017 में ही सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड को चुनौती दी गई थी. लेकिन इसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में साल 2019 में शुरू हुई थी. 12 अप्रैल 2019 को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राजनीतिक दलों को आदेश दिया था कि वो 30 मई 2019 तक इलेक्टोरल बॉन्ड से मिली राशि समेत तमाम जानकारियां इलेक्शन कमीशन को बंद लिफाफे में दें. 

2019 में रोक लगाने की मांग

इसके बाद दिसंबर 2019 में ही एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर रोक लगाने की मांग की थी.

कंपनी या कोई व्यक्ति कितने भी  इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद सकता है. इसकी कोई लिमिट भी नहीं है. इस योजना को लागू करने से पहले सभी राजनीतिक दलों को 20 हजार रुपये से ऊपर मिलने वाले चंदे को सार्वजनिक करना होता था. साथ ही साथ कोई कंपनी अपने मुनाफे के केवल 7.5 फीसदी या राजस्व का 10 फीसदी किसी राजनीतिक पार्टी को डोनेट कर सकते थी.