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उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज

भारत का सुप्रीम कोर्ट सोमवार को एक्टिविस्ट उमर खालिद, स्कॉलर शरजील इमाम और पांच अन्य लोगों द्वारा दायर जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुना सकता है. 

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Shilpa Srivastava

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट सोमवार को एक्टिविस्ट उमर खालिद, स्कॉलर शरजील इमाम और पांच अन्य लोगों द्वारा दायर जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुना सकता है. बता दें इन सभी पर 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों को लेकर आरोप लगा है. याचिका में गैरकानूनी एक्टिविटी अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए हैं. यह मामला लगभग पांच साल से चल रहा है. यह अब अदालतों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने दिसंबर में दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. लंबी सुनवाई के दौरान, आरोपियों के वकीलों और दिल्ली पुलिस ने अपना-अपना पक्ष रखा. जमानत याचिकाओं में सितंबर 2023 के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था. याचिका में कहा गया था कि आरोप बहुत गंभीर थे और इसमें एक बड़ी साजिश शामिल थी.

मामले पर क्या है पुलिस का पक्ष: 

पुलिस के अनुसार, उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद फरवरी 2020 में हुई हिंसा के मुख्य योजनाकार थे. ये दंगे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए थे. हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए, जिससे यह कई सालों में दिल्ली में दंगों से जुड़ी सबसे खराब घटनाओं में से एक बन गई.

दिल्ली पुलिस जमानत का कर रही कड़ा विरोध:

दिल्ली पुलिस जमानत देने का कड़ा विरोध कर रही है. उनका कहना है कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि सोच-समझकर प्लान की गई थी. अपने हलफनामे में, पुलिस ने दंगों को भारत की स्थिरता और वैश्विक स्तर पर छवि को नुकसान पहुंचाने की एक सोची-समझी कोशिश बताया है. उन्होंने अपने दावों के समर्थन में फोन रिकॉर्ड, मैसेज, गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक डेटा पेश किए हैं. पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों पर अनावश्यक आवेदन दायर करके और ठीक से सहयोग न करके जानबूझकर ट्रायल में देरी करने का भी आरोप लगाया है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है कि यह एक मिसाल कायम कर सकता है कि UAPA जैसे सख्त कानूनों के तहत जमानत कैसे दी जाती है, खासकर उन मामलों में जिनमें बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है.