सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की समय सीमा एक सप्ताह बढ़ा दी है. कोर्ट ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि इस प्रक्रिया में कोई रुकावट या बाधा नहीं डाली जाएगी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ कहा, "हम रुकावटें दूर करेंगे, लेकिन SIR को पूरा होने से नहीं रोकेंगे. यह बात सबको समझ लेनी चाहिए." सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जोयमल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया भी शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की.
चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील डी.एस. नायडू ने कहा कि मतदाता सूची सुधारने के लिए चुनावी रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) होने चाहिए, जिनके पास फैसला लेने का अनुभव हो. उन्होंने बताया कि आयोग ने 300 ग्रुप बी अधिकारियों की मांग की थी, लेकिन केवल 64 अनुभवी अधिकारी मिले. बाकी इंजीनियर जैसे अधिकारियों को पे के आधार पर लगाया गया, जो ऐसे फैसले लेने के लिए सही नहीं हैं. कोर्ट में माइक्रो ऑब्जर्वर की भूमिका पर भी बहस हुई. वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने का काम माइक्रो ऑब्जर्वर का नहीं होना चाहिए. इससे बहुत से असली मतदाता बाहर हो सकते हैं.
उन्होंने आंकड़े दिए कि ड्राफ्ट रोल में 7.08 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 6.75 करोड़ मैप हो चुके हैं. करीब 32 लाख मैप नहीं हुए और 1.36 करोड़ में 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' है. इनमें से आधे से ज्यादा मामलों में सिर्फ नाम में छोटा फर्क है, जैसे 'दत्ता' और 'दत्त' या 'रॉय' और 'रे'. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि माइक्रो ऑब्जर्वर सिर्फ मदद करते हैं, अंतिम फैसला ERO का ही होगा.
वहीं पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बाहर से आए माइक्रो ऑब्जर्वर स्थानीय भाषा और हालात नहीं समझते. उन्होंने कहा कि राज्य ने पहले से 80 हजार से ज्यादा बूथ लेवल अधिकारी और हजारों ग्रुप बी अधिकारी दिए हैं.
कोर्ट ने अधिकारियों की नियुक्ति में प्रक्रिया की कमी भी बताई और कहा कि पूरी डिटेल और सही नाम से काम होना चाहिए. कोर्ट ने SIR को समय पर पूरा करने के साथ-साथ मतदाताओं के साथ न्याय सुनिश्चित करने पर जोर दिया. बता दें कि पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में हो रहे एसआईआर को चुनौती दी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कोर्ट में पेश होकर अपनी याचिका पर बहस कर चुकी हैं.