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पति ने पत्नी को बिना बताए एक रात के लिए मायके रुकने पर मारा थप्पड़, गुजरात हाईकोर्ट ने नहीं माना क्रूरता, जानें क्या दिया तर्क?

गुजरात हाईकोर्ट ने पत्नी के साथ क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा रद्द कर दी. अदालत ने कहा कि सामान्य घरेलू विवाद और थप्पड़ की एक घटना आईपीसी की धारा 498A और 306 के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

GROK
Reepu Kumari

गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पत्नी की आत्महत्या से जुड़े मामले में दोषसिद्धि को खारिज कर दिया. जस्टिस गीता गोपी की एकल पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रत्यक्ष और ठोस प्रमाण पेश करने में असफल रहा. अदालत ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मनमुटाव को आपराधिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. फैसले में कहा गया कि जब तक आत्महत्या के लिए उकसाने का स्पष्ट इरादा और निकटतम कारण साबित न हो, तब तक दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती.

निचली अदालत का फैसला और अपील

मामला दिलीपभाई मंगलभाई वारली से जुड़ा है, जिनकी पत्नी की शादी के लगभग एक वर्ष बाद खेत में फांसी से मौत हुई थी. वलसाड की जिला अदालत ने 20 मई 2003 को उन्हें आईपीसी की धारा 498A के तहत एक वर्ष और धारा 306 के तहत सात वर्ष की सजा सुनाई थी. इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

पक्षकारों की दलीलें

23 साल बाद दोषी पति की सजा को रद्द करते हुए अदालत ने कहा बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोप सामान्य घरेलू विवादों पर आधारित थे. पति जीआईडीसी में काम करता था और अतिरिक्त आय के लिए रात में बेंजो बजाता था, जिससे देर से घर लौटने पर विवाद होते थे. राज्य पक्ष ने मृतका की मां की गवाही और आरोपी के व्यवहार को संदेहास्पद बताया, लेकिन अदालत ने सबूतों को अपर्याप्त माना.

मेडिकल साक्ष्य और कानूनी नजीर

चिकित्सीय साक्ष्य में मौत का कारण फांसी से दम घुटना पाया गया. पोस्टमार्टम में हाइपोइड हड्डी सुरक्षित थी, जिससे हत्या की आशंका खारिज हुई. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी के सात वर्ष के भीतर आत्महत्या मात्र से उकसावे की धारणा स्वतः स्थापित नहीं होती.

अदालत की टिप्पणी

अदालत ने कहा, 'बिना बताए मायके में रात भर रुकने की वजह से पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारने की एक घटना को क्रूरता नहीं गिना जाएगा.' साथ ही स्पष्ट किया गया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का सकारात्मक कृत्य सिद्ध होना आवश्यक है. अभियोजन पक्ष लगातार और असहनीय उत्पीड़न साबित करने में विफल रहा.

अंतिम फैसला 

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत का निष्कर्ष साक्ष्यों के अनुरूप नहीं था. अपील स्वीकार करते हुए 20 मई 2003 का फैसला रद्द कर दिया गया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. अदालत ने दोहराया कि संदेह के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती.