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देश में हर मिनट में 3 लड़कियां बाल विवाह के लिए मजबूर, रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

Child Marriage Study: देश में हर मिनट में 3 लड़कियों को चाइल्ड मैरिज के लिए मजबूर किया जाता है. एक गैर सरकारी संगठन (NGO) के स्टडी में ये खुलासा हुआ है. स्टडी में कहा गया है कि अधिकतर मामलों में दूल्हे की उम्र 21 साल से अधिक होती है. इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन रिसर्च टीम ने अपनी एक स्टडी में ये खुलासा किया है. तीन रिपोर्ट्स के आंकड़ों का विश्लेषण कर ये रिपोर्ट तैयारी की गई है.

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Child Marriage Study: हम 21वीं सदी में 24 साल बिता चुके हैं, लेकिन भारत में हर मिनट तीन बच्चियों की जबरन शादी की जा रही है. ये चौंकाने वाले आंकड़े 'इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन' रिसर्च टीम के एक नए स्टडी में सामनेआई है, जो नागरिक समाज संगठनों के 'बाल विवाह मुक्त भारत' नेटवर्क का हिस्सा है. रिपोर्ट में जनगणना 2011, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, 2018-2022 के लिए एनसीआरबी के आंकड़ों में 3,863 बाल विवाह दर्ज हैं.

NFHS-5 के अनुमान बताते हैं कि 20-24 आयु वर्ग की 23.3% महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले हो गई थी. असम को बाल विवाह पर अंकुश लगाने में एक केस स्टडी के रूप में बताया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021-22 और 2023-24 के बीच, असम के 20 जिलों के 1,132 गांवों में बाल विवाह में 81% की गिरावट आई है. आंकड़ों में बात की जाए तो ये गिरावट 2021-22 में 3,225 मामलों से गिरकर 2023-24 में 627 तक पहुंची है. पिछले साल, इस अपराध के लिए 3,000 से अधिक गिरफ्तारियां भी हुईं हैं.

सख्त कानून की वजह से असम में आ रही कमी

असम के 1132 गांवों में किए गए सर्वे में 98% उत्तरदाताओं का मानना ​​था कि राज्य में सख्त कानून लागू होने के कारण बाल विवाह की संख्या में कमी आ रही है. देश की बात की जाए तो भारत में बाल विवाह पर पहली बार 1929 में प्रतिबंध लगाया गया था. इस अधिनियम में कई बार सुधार किया गया है. हालांकि, जो आंकड़े सामने आए हैं, उससे साबित होता है कि ये कुप्रथा आज भी जारी है. ये गंभीर चिंता का विषय है.

बाल विवाह को समाप्त करने से मातृ और शिशु मृत्यु दर, महिला श्रम शक्ति भागीदारी और लैंगिक समानता में भी सुधार हो सकता है. 2021 का विधेयक, जिसमें बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 में संशोधन करने की मांग की गई थी, को नए सिरे से लिया जाना चाहिए. लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी कुप्रथा सामाजिक स्वीकृति के बिना जिंदा नहीं रह सकती. इसलिए अधिकारियों के साथ-साथ गैर सरकारी संगठनों को भी मिशन मोड में काम करना चाहिए.

आखिर क्यों बाल विवाह के लिए लड़कियों को किया जा रहा मजबूर?

रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालतों में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे और सजा की खराब दर उन लोगों को प्रोत्साहित करती है जो लड़कियों की शादी करने के इरादे से ऐसा करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 में बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत अदालतों में सुनवाई के लिए लिस्टेड कुल 3,563 बाल विवाह मामलों में से, केवल 181 मामलों में ही सुनवाई पूरी होने तक सफलतापूर्वक निपटारा हो पाया. लंबित मामलों का परसेंटेज 92% है. दोषसिद्धि दर 11% है. 

विभिन्न गैर सरकारी संगठनों की ओर से रोके गए बाल विवाहों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल विवाह के अधिकांश मामले बालिकाओं की कमज़ोरी का फायदा उठाने के उदाहरण हैं, जिसमें बड़े पुरुष अपने अधिकार की स्थिति और इन लड़कियों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाते हैं.