नई दिल्ली: भारत में महंगाई के नए आंकड़ों ने आर्थिक हलकों का ध्यान खींचा है. जनवरी 2026 में नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला के तहत खुदरा महंगाई 2.75% दर्ज की गई, जो पिछले आठ महीनों में सबसे अधिक है.
हालांकि, यह दर अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक के तय दायरे के भीतर है. नई श्रृंखला में कई पद्धतिगत बदलाव किए गए हैं, जिनका असर आने वाले समय में मौद्रिक नीति के फैसलों पर पड़ सकता है.
दिसंबर 2025 में पुरानी श्रृंखला के तहत महंगाई 1.3% थी, जबकि जनवरी में नई श्रृंखला लागू होने के बाद यह 2.75% हो गई. इससे पहले मई 2025 में यह 2.82% पर थी. जनवरी में खाद्य महंगाई 2.13% रही. जीएसटी में तर्कसंगत बदलाव और व्यापार समझौतों से बाजार में भरोसा बना हुआ है.
नई श्रृंखला में खाद्य वस्तुओं का भार घटाकर लगभग 36.8% कर दिया गया है, जो पहले करीब आधा था. आधार वर्ष 2012 से बदलकर 2024 किया गया है. अब कीमतों का संग्रह देशभर से किया जा रहा है और ग्रामीण आवास किराया जैसी नई श्रेणियां जोड़ी गई हैं.
अपडेटेड सीपीआई अब ऑनलाइन खरीदारी, बाहर भोजन और अमेजन-नेटफ्लिक्स जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं पर खर्च को भी ट्रैक करेगा. यह बदलाव ऐसे समय आया है, जब आरबीआई के महंगाई पूर्वानुमान मॉडल पर सवाल उठे थे, क्योंकि उसने कीमतों के दबाव को ज्यादा आंका था.
बाजार इस नई श्रृंखला पर करीबी नजर रखे हुए है, क्योंकि इससे ब्याज दरों में बदलाव आने की संभावना है. विदेशी निवेश भी नीति संकेतों के प्रति संवेदनशील है. फिलहाल, संकेत मिल रहे हैं कि रेपो दर में लंबा विराम संभव है.
वित्त वर्ष 31 मार्च 2026 तक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.4% रहने का अनुमान है और अगले साल भी 7% से अधिक रहने की उम्मीद है. डीबीएस बैंक की कार्यकारी निदेशत राधिका राव के अनुसार, नई श्रृंखला में हल्का ऊपरी झुकाव दिखा, जबकि एमके ग्लोबल की माधवी अरोड़ा मानती हैं कि निकट भविष्य में नीति पर इसका बड़ा असर नहीं पड़ेगा.