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Mahakumbh 2025: कितना पुराना है महाकुंभ का इतिहास, जानें क्या कहती हैं धार्मिक मान्यताएं?

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इन दिनों महाकुंभ की धूम है. 13 जनवरी से यहां शाही स्नान की शुरुआत हो चुका है, जो कि 26 फरवरी तक जारी रहेगी. कुंभ मेला भारत की सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिकता का ऐसा अद्वितीय संगम है, जो समाज में एकता, उत्सवधर्मिता और सर्वग्राह्यता का प्रतीक है.

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Garima Singh

Mahakumbh 2025: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इन दिनों महाकुंभ की धूम है.13 जनवरी से यहां शाही स्नान की शुरुआत हो चुकी है, जो कि 26 फरवरी तक जारी रहेगी. कुंभ मेला भारत की सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिकता का ऐसा अद्वितीय संगम है, जो समाज में एकता, उत्सवधर्मिता और सर्वग्राह्यता का प्रतीक है.

सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए महाकुंभ स्नान न केवल पवित्रता का प्रतीक है, बल्कि यह उनकी आस्था की जड़ों को भी सुदृढ़ करता है। यह पर्व संस्कृति की संपूर्णता, सार्वभौमिकता और आध्यात्मिकता के मूलभूत तत्वों को संजोता है.

इतिहास में झलकता कुंभ मेला

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, महाकुंभ मेले का इतिहास लगभग 850 साल पुराना है. हालांकि, कुछ विद्वान इसे 525 ईसा पूर्व से प्रारंभ मानते हैं. गुप्त काल के दौरान कुंभ आयोजन को सुव्यवस्थित रूप से प्रारंभ किया गया था. सम्राट हर्षवर्धन (617-647) के शासनकाल में कुंभ के आयोजनों के प्रमाणिक साक्ष्य मिलते हैं. इसके बाद आदि जगतगुरु शंकराचार्य और उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी अखाड़ों के लिए कुंभ स्नान की परंपरा को और मजबूत किया.

पौराणिक आधार

कुंभ मेले का इतिहास केवल इतिहास के पन्नों में सीमित नहीं है. इसका उल्लेख वेद-पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है. ऋग्वेद में प्रयाग और तीर्थ स्नान का उल्लेख पवित्रता और मोक्ष के साधन के रूप में किया गया है. महाभारत में भी इसे पापों के प्रायश्चित के रूप में वर्णित किया गया है. महाभारत के तीर्थयात्रा पर्व में कहा गया है कि जो व्यक्ति माघ के महीने में दृढ़ व्रत का पालन करते हुए प्रयाग में स्नान करता है, वह पापों से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है.

विदेशी यात्रियों की नजर में कुंभ मेला

7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने लेखों में हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रयाग के कुंभ मेले का जिक्र किया है. इससे स्पष्ट होता है कि यह पर्व न केवल भारतीय समाज में महत्व रखता था, बल्कि वैश्विक ध्यान भी आकर्षित करता था.

धार्मिक और सामाजिक महत्व

कुंभ मेले के आयोजन का प्रमुख उद्देश्य हिंदू संस्कृति की एकसूत्रता को प्रकट करना है. मत्स्य पुराण और अन्य ग्रंथों में प्रयाग और अन्य पवित्र स्थानों पर तीर्थ स्नान को मोक्ष का मार्ग बताया गया है. यही कारण है कि आज भी कुंभ मेला न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.

(यहां बताई गई सभी जानकारी धार्मिक मान्यताओं और ग्रंथों से लिए गए हैं. इंडिया डेली लाइव इसकी पुष्टि नहीं करता)