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पश्चिम बंगाल में SIR बदल सकता है नतीजों का रुख? चुनावी दंगल में दीदी और BJP के बीच कांटे की टक्कर; समझें पूरा गणित

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले चुनाव आयोग की विवादास्पद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में करीब 91 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं.

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Edited By: Reepu Kumari
पश्चिम बंगाल में SIR बदल सकता है नतीजों का रुख? चुनावी दंगल में दीदी और BJP के बीच कांटे की टक्कर; समझें पूरा गणित
Courtesy: ANI

कोलकाता: देश में जब भी चुनाव का समय आता है सबसे पहला सवाल यही उठता है कि कौन मारेगा बाजी. इसका अंदाजा पहले से लगाना मुश्किल है. ये वो रणभूमी है जिसमें जीत का ताज किसी के सिर सज सकता है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का माहौल गर्म है. 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान हो रहा है. चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए हैं. पहले चरण में 58 लाख के आसपास डिलीट हुए, फिर 60 लाख नामों को अंडर एडजुडिकेशन में रखा गया जिसमें से 27 लाख और हटाए गए. मुस्लिम बहुल इलाकों में ये आंकड़े ज्यादा हैं.

दीदी के लिए मुश्किल?

दीदी ममता बनर्जी बीजेपी के खिलाफ अपनी 15 साल की सरकार का रिकॉर्ड बचाने की कोशिश कर रही हैं. दोनों तरफ सख्त लाइनें खींची जा रही हैं, लेकिन मैदान पर हकीकत ज्यादा जटिल नजर आ रही है. वोट देने का अधिकार लोकतंत्र का आधार है.

SIR पर सवाल

SIR में इस अधिकार को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. बोझ साबित करने का दायित्व आम वोटर पर डाला गया है. बंगाल के वोटरों को दूसरे राज्यों से ज्यादा दस्तावेजी बाधाएं पार करनी पड़ी हैं. 19 अपील ट्रिब्यूनल देर से शुरू हुए और शुरुआती मतदान तक सिर्फ मुट्ठी भर मामलों में ही वोटिंग अधिकार बहाल हुआ. इसका असर 4 मई के नतीजों में दिख सकता है. लेकिन चुनाव की यही तो खासियत है नतीजे हमेशा उम्मीद से अलग होते हैं. 

SIR से फैला डर और वंचित होने का डर

SIR प्रक्रिया ने बड़े पैमाने पर वोटर हटाने की आशंका जगाई है. मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में डिलीट ज्यादा होने से अल्पसंख्यक समुदाय में गुस्सा और घबराहट है. कई जगहों पर नाम हटने के बाद लोग पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों? दस्तावेज देने के बावजूद नाम गायब हो गया तो क्या होगा? कुछ को डर है कि उन्हें बांग्लादेशी करार दे दिया जाएगा. कोलकाता के जोका में अपील ट्रिब्यूनल के बाहर लोग घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन अंदर जाने की इजाजत नहीं मिलती. पुलिस वाले गेट पर खड़े रहते हैं. ये तस्वीर लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है.

अस्मिता की बहस और घर की पहचान

मुस्लिम मोहल्लों में SIR को लेकर नाराजगी है, लेकिन साथ ही अपनी जड़ों पर जोर भी है. कई लोग कहते हैं कि हम इस देश के हैं, बाहरी लोगों को निकालना चाहिए. वहीं हिंदू इलाकों में SIR को जरूरी सफाई का काम माना जा रहा है. छोटे व्यापार करने वाले कहते हैं कि संसाधन सीमित हैं, बाहरी आकर हमारा हक छीन लेते हैं. बंगाली अस्मिता को लेकर भी बहस तेज है.

टीएमसी इसे बीजेपी पर हमले के रूप में इस्तेमाल कर रही है, जबकि बीजेपी बंगाली चेहरे और भाषा का सहारा लेकर जवाब दे रही है. इतिहासकार तपती गुहा ठाकुरता कहती हैं कि बंगाल का विभाजन कभी साफ नहीं था, आबादी हमेशा तरल रही है.

बंगाली अस्मिता और हिंदुत्व की टकराव

बीजेपी इस चुनाव में पूरी तरह बंगाली कैंपेन चला रही है. मेनिफेस्टो से लेकर पोस्टर्स तक बंगाली भाषा का इस्तेमाल, बंगाली माध्यम स्कूल पढ़े नेता को मुख्यमंत्री बनाने का वादा. वहीं टीएमसी बंगाली अस्मिता को बचाने का दावा कर रही है. लेकिन जमीन पर ये विभाजन भी साफ नहीं दिखता. कुछ लोग कहते हैं कि बच्चे केरल में काम करते हैं तो भाषा का रोष कैसे हो? दूसरी तरफ भद्रलोक वर्ग टीएमसी की लोकलुभावन नीतियों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर नाराज है. बंगाली अस्मिता पहले ज्यादा व्यापक थी, दोनों बंगाल को संस्कृति और भाषा जोड़ती थी. अब ये संकुचित हो गई लगती है.

कुर्माली भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन

बीजेपी 2021 के 77 सीटों से आगे बढ़ने की कोशिश में हिंदुत्व के साथ उप-जातीय अपील भी कर रही है. कमतापुरी और कुर्माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया गया है. ममता बनर्जी पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और हिंदू धार्मिक भावनाओं को लुभाने दोनों के आरोप लग रहे हैं. चट पूजा की छुट्टी, दुर्गा मंदिर परिसर जैसे फैसले इसी का हिस्सा बताए जा रहे हैं.

दीदी बीजेपी के दादा से मुकाबला करते हुए अपनी 15 साल की सरकार का सामना भी कर रही हैं. दोनों तरफ सख्त लाइनें खींचने की कोशिश है, लेकिन मैदान पर ये रेखाएं ज्यादा पिघली हुई और जटिल नजर आती हैं.

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