इस देश में महिलाओं की कमाई पुरुषों से भी ज्यादा
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
पिछले पांच दशकों में महिलाओं की वर्कफोर्स में भागीदारी लगातार बढ़ी है. आज महिलाएं बड़े पदों पर नेतृत्व कर रही हैं और हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं. इसके बावजूद, अधिकतर देशों में महिला कर्मचारियों को पुरुषों से कम सैलरी ही मिल रही है.
क्या है Gender Pay Gap?
पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम सैलरी मिलने की समस्या को Gender Pay Gap कहा जाता है. यह पुरुषों और महिलाओं की औसत कमाई का अंतर होता है, जिसे प्रतिशत में मापा जाता है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, महिलाएं विश्वभर में 20% कम कमाई करती हैं.
विकसित देशों में भी वही कहानी
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अधिकतर देशों में महिलाओं की सैलरी अभी भी पुरुषों से कम है. रोजगार बढ़ा है, लेकिन वेतन समानता अब भी चुनौती बनी हुई है.
कौन है यह अपवाद देश?
यूरोस्टैट की रिपोर्ट में पाया गया कि यूरोप का छोटा सा देश लक्जमबर्ग इस मामले में सबसे आगे है. यहां महिलाएं पुरुषों से अधिक सैलरी हासिल कर रही हैं, जो दुनिया के लिए एक अनोखी मिसाल है.
लक्जमबर्ग की खासियत
Gender Pay Gap यहां -0.7% है, जिसका अर्थ है कि महिलाएं थोड़ी अधिक कमाई कर रही हैं. यह अंतर बताता है कि लक्जमबर्ग महिलाओं की रोजगार नीतियों और वेतन संरचना को लेकर कितना जागरूक है.
जेंडर पॉलिसी की भूमिका
लक्जमबर्ग ने जेंडर इक्वालिटी पर बेहद मजबूत पॉलिसी बनाई है. यहां महिलाओं को समान अवसर, उच्च पदों तक पहुंच और बेहतर वर्क एनवायरनमेंट मिलता है, जिससे उनकी कमाई में स्वाभाविक रूप से बढ़ोतरी हुई है.
पब्लिक सेक्टर की ताकत
यहां महिलाओं की पब्लिक सेक्टर में बड़ी संख्या में नौकरी है, जहां वेतन संरचना बेहतर और अधिक निष्पक्ष मानी जाती है. इससे महिलाओं की औसत सैलरी पुरुषों से आगे निकल जाती है.
दुनिया के सबसे अमीर देशों में शामिल
लक्जमबर्ग आर्थिक रूप से बेहद मजबूत देश है. इसकी आर्थिक स्थिरता और उच्च आय वाले सेक्टर महिलाओं को बेहतर वेतन पाने का मौका देते हैं, जो अन्य देशों के लिए भी सीख है.
क्या दुनिया सीख सकती है?
लक्जमबर्ग मॉडल दिखाता है कि मजबूत नीतियां, समान अवसर और निष्पक्ष वेतन संरचना Gender Pay Gap को खत्म कर सकती हैं. यह मॉडल कई देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है.