क्षेत्रीयता बनाम राष्ट्रीयता की लड़ाई: वेस्ट बंगाल के नतीजे यूपी असेंबली इलेक्शन को प्रभावित करेंगे?
बंगाल में टीएमसी की तरह यूपी में बीजेपी को समाजवादी पार्टी से चुनौती मिलेगी, दोनों क्षेत्रीयता के पैरोकार हैं और टीएमसी व सपा का टैंपरामेंट काफी मिलता- जुलता है, सोशल इंजीनियरिंग भी.
नई दिल्ली: 4 मई को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ जाएंगे, नतीजों से पहले पूरे देश का सियासी तापमान बढ़ा हुआ है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा वेस्ट बंगाल को लेकर है. सियासतदारों के साथ ही आम आदमी भी वेस्ट बंगाल के नतीजों को लेकर उत्सुक है. उसका कारण है कि यही वो राज्य है, जो बीजेपी के खिलाफ या पक्ष में नैरेटिव सैट करने वाला होगा. यही वो राज्य है जो राजनीति में क्षेत्रीयता बनाम राष्ट्रीयता का नैरेटिव सैट करेगा.
ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे मुखर चेहरा
दरअसल, आज की तारीख में बीजेपी को सबसे तल्ख चुनौती देने वालीं बंगाल की सीएम ममता बनर्जी एक तरह से विपक्ष का आखिरी मजबूत किला भी मानी जा रही हैं, यह किला ढहा तो विपक्ष के नामोंनिशां का खतरा उत्पन्न होता दिख रहा है. इसकी बड़ी वजह यह भी है कि टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी हर कदम पर बीजेपी का मुखर मुकाबला कर रही हैं, केंद्र की नीतियों से भी खुलकर लड़ रही हैं. तीन बार की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनैतिक भविष्य इस चुनाव से तय होगा तो यूपी जैसे राज्यों की राजनीति भी प्रभावित होगी.
यूपी पर क्यों होगा सबसे ज्यादा प्रभाव?
सियासी जानकार मानते हैं कि वेस्ट बंगाल असेंबली इलेक्शन का रिजल्ट सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश को प्रभावित करेगा. उसके कई कारण हैं. सबसे पहला कारण तो यही है कि यूपी में 2027 में इलेक्शन होने हैं, वेस्ट बंगाल के नतीजे तब तक सामयिक रहने वाले हैं. दूसरा, यूपी में बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी से मिलने वाली है और टीएमसी व सपा टैंपरामेंट बहुत कुछ मिलता- जुलता है. दोनों पार्टियां अपने- अपने राज्यों में प्रभावी हैं और इनकी सोशल इंजीनियरिंग भी काफी मिलती- जुलती है, इतना ही नहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी के अच्छे रिश्ते सर्वविदित हैं, दोनों राजनैतिक मंच भी साझा करते रहे हैं और आगे भी इसकी संभावना है.
2014 में सिमट गए थे क्षेत्रीय दल
2014 में जब बीजेपी पीएम मोदी के नेतृत्व में केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई तो सियासी पंडितों ने मान लिया था कि अब क्षेत्रीय दलों के दिन ढल गए. हुआ भी वही. उस समय यूपी में समाजपार्टी की सरकार थी लेकिन 2017 के असेंबली इलेक्शन में बीजेपी स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आ गई जबकि यूपी में 28 वर्षों से क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय दलों को बनवास दे रखा था. सपा और बसपा, बारी- बारी से सूबे पर राज करती रहीं.
47 सीटों पर सिमट गई थी सपा
2012 में 224 सीटों के साथ क्लियर मेजोरिटी के साथ सत्ता में आई सपा 2017 में केवल 47 सीटों पर सिमट गई थी और बसपा मात्र 19 सीटों पर. वेस्ट यूपी में अच्छा प्रभाव रखने वाला राष्ट्रीय लोकदल तो मात्र एक सीट पर सिमट गया था और 312 सीटों के साथ बीजेपी की मजबूत सरकार बनी. यानी क्षेत्रीय दलों की एक तरह से छुट्टी ही हो गई थी.
2022 में फिर उभरी सपा
लेकिन समय के साथ समाजवादी पार्टी संभली और 2022 के यूपी असेंबली इलेक्शन में 111 सीटें जीतकर साबित कर दिया कि क्षेत्रीय दलों को सिरे से नहीं नकारा जा सकता, हालांकि बसपा इस चुनाव में मात्र एक सीट पर सिमट कर रह गई थी. सपा और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) ने यह चुनाव मिलकर लड़ा था, 2017 में एक सीट पर जा गिरे आरएलडी को भी आठ सीटें मिल गई थीं.
2024 में बड़ी मजबूत होकर उभरी सपा
2022 के यूपी असेंबली इलेक्शन में पार्टनर रहा राष्ट्रीय लोकदल 2024 लोकसभा इलेक्शन से पहले सपा का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल हो गया लेकिन फिर भी समाजवादी पार्टी ने लोकसभा भी इस बार सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था, पार्टी ने यूपी से लोकसभा की 37 सीटें जीत ली थीं, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. इस चुनाव में बीएसपी जीरो पर आउट हो गई थी.
यूपी में बीजेपी के लिए सपा सबसे बड़ी चुनौती
कुल मिलाकर यूपी असेंबली इलेक्शन में बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती सपा से ही मिलने वाली है. यूपी में 2022 असेंबली इलेक्शन के वोट ट्रेंड की बात करें तो बीजेपी का वोट शेयर करीब 43 परसेंट, सपा का 34 परसेंट, बसपा का 13 परसेंट और कांग्रेस का मात्र 3 परसेंट रह गया था, इस हिसाब से 2027 यूपी असेंबली इलेक्शन सत्ता पर काबिज बीजेपी को सबसे बड़ी चुनौती सपा से ही मिलने वाली है.
वेस्ट बंगाल से मिलते हैं यूपी के ये मुद्दे
वेस्ट बंगाल असेंबली इलेक्शन से सियासी पंडित इसलिए भी यूपी को रिलेट कर रहे हैं क्योंकि दोनों राज्यों के कुछ मुद्दे मिलते- जुलते हैं. एसआईआर का मुद्दा, बंगाल के साथ यूपी में भी रहेगा. अखिलेश यादव लगातार एसआईआर पर सवाल उठाते रहे हैं. ममता बनर्जी इस मुद्दे पर बंगाल में वोटिंग का दावा कर चुकी हैं, हालांकि असलियत क्या है? इसका खुलासा 4 मई को मतगणना के बाद ही होगा.