झारखंड में राज्यसभा सीट पर बड़ा दांव! कांग्रेस ने एक सीट पर ठोका दावा, शिबू सोरेन वाली सीट पर झामुमो की जीत पक्की
झारखंड में राज्यसभा की दो खाली सीटों पर राजनीतिक घमासान मचा है. कांग्रेस प्रभारी के.राजू ने इंडिया गठबंधन की ओर से एक सीट पर दावा ठोका है. शिबू सोरेन के निधन और दीपक प्रकाश के कार्यकाल खत्म होने से ये सीटें खाली हुई हैं, जिसमें झामुमो की एक सीट पर जीत लगभग तय है.
रांची: झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है. पिछले साल चार अगस्त को दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से एक सीट खाली हुई, जबकि भाजपा नेता दीपक प्रकाश का कार्यकाल खत्म होने से दूसरी सीट भी जल्द खाली होगी. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के.राजू ने साफ कहा है कि इंडिया गठबंधन की ओर से एक सीट पर उनका दावा है. सत्ताधारी झामुमो और कांग्रेस के साथ-साथ मुख्य विपक्षी भाजपा भी इन सीटों पर पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है. बजट सत्र के बाद सभी दल रणनीति बनाने में जुट गए हैं.
दो सीटों पर होगा चुनाव
राज्यसभा की दो सीटें झारखंड से खाली होने वाली हैं. पहली सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद से खाली पड़ी है. दूसरी सीट भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल पूरा होने पर खाली होगी. इन दोनों सीटों के लिए चुनाव होने हैं. सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष दोनों इन पर कब्जा जमाने की कोशिश में हैं. राजनीतिक दल विधायकों की संख्या के आधार पर गणित जोड़ रहे हैं.
झामुमो की एक सीट पर जीत तय
झारखंड विधानसभा में झामुमो के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा 34 है. राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कम से कम 27 प्रथम वरीयता वाले वोट जरूरी हैं. ऐसे में झामुमो की एक सीट पर जीत लगभग पक्की मानी जा रही है. पार्टी के पास पर्याप्त संख्या होने से कोई दूसरा दल यहां चुनौती नहीं दे सकता. यह सीट झामुमो के खाते में जाने वाली समझी जा रही है.
दूसरी सीट पर कांटे की टक्कर
दूसरी सीट पर मुकाबला रोचक होने वाला है. यहां किसी भी दल को जीत के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा. विधानसभा में भाजपा के 21, कांग्रेस के 16, राजद के 4, भाकपा-माले के 2, आजसू का 1, जदयू का 1 और लोजपा (आर) का 1 विधायक है. कांग्रेस ने इस सीट पर दावा ठोक दिया है. गठबंधन के समर्थन से कांग्रेस मजबूत स्थिति में दिख रही है.
राजनीतिक रस्साकशी और आगे की रणनीति
कांग्रेस प्रभारी के.राजू के दावे से गठबंधन में एकता का संदेश गया है. वहीं भाजपा भी अपनी रणनीति बना रही है. दोनों दल छोटे दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे. बजट सत्र के बाद विधायकों पर दबाव बढ़ सकता है. इन चुनावों का असर झारखंड की सियासत पर लंबे समय तक रहेगा. सभी की नजरें अब उम्मीदवारों के नाम और गठबंधन की रणनीति पर टिकी हैं.
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