'भारत को तोड़ना चाहते हैं...' उमर खालिद को जमानत न मिलने के बाद JNU में लगे विवादित नारे; BJP ने किया पलटवार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के साबरमती छात्रावास में कुछ लोगों ने नारे लगाए. यह तब हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शेरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दिया.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शेरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दिया. खबरों की मानें तो सोमवार को दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विवादास्पद नारे लगाए गए हैं.

यहां यह जानना जरुरी है कि ये दोनों पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं. उन पर 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक 'बड़े षड्यंत्र' मामले में आरोप लगाए गए हैं .

बीजेपी ने नारे पर क्या कहा?

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता और दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने आज पूछा कि अगर वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दें तो कहने के लिए क्या बचेगा?

उन्होंने कहा, 'उनका इस देश से कोई संबंध नहीं है. वे ऐसे लोग हैं जो भारत को तोड़ना चाहते हैं, वे प्रधानमंत्री के बारे में गलत बातें करते हैं.'

साबरमती हॉस्टल में लगे नारे 

सूत्रों के मुताबिक, रात 9 बजे से 10 बजे के बीच जेएनयू के साबरमती हॉस्टल में कुछ लोगों ने नारे लगाए. सूत्रों ने बताया कि जब नारेबाजी हो रही थी, तब वामपंथी समर्थित जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के संयुक्त सचिव दानिश और सचिव सुनील मौके पर मौजूद थे.

अन्य वामपंथी छात्र समूहों ने भी इसमें लिया भाग 

नारों में ताबूतों और प्रधानमंत्री मोदी के नाम का जिक्र था, जो धमकी का सीधा संदेश प्रतीत होता था, न कि सिर्फ एक संकेत.

खालिद और इमाम भी कभी जेएनयू में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित नारेबाज़ी करने वाले समूह का हिस्सा थे, जैसे कन्हैया कुमार और शहला राशिद थे. कुमार और राशिद अब अलग हो चुके हैं. एबीवीपी ने शिकायत दर्ज कराने की बात कही है.

जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सचिव प्रवीण के पीयूष ने आज एनडीटीवी को बताया, "वामपंथी छात्रों ने साबरमती हॉस्टल के पास नारे लगाए. उन्होंने आरएसएस, एबीवीपी, पीएम मोदी जी के खिलाफ गलत बातें कीं."

जमानत पर वैधानिक रोक

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने सोमवार को कहा कि अभियोजन सामग्री से खालिद और इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिससे गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी (5) के तहत जमानत पर वैधानिक रोक लगती है.

इसमें कहा गया है कि इस समय, अभियोजन पक्ष के साक्ष्य और अन्य सामग्री 'उनकी जमानत पर रिहाई को उचित नहीं ठहराते', साथ ही यह भी कहा गया है कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि वे योजना बनाने, लामबंदी करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश जारी करने के स्तर पर शामिल थे.

अन्य को मिली जमानत 

अदालत ने इस मामले में नामजद पांच अन्य लोगों - गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद - को जमानत दे दी.

इन सभी सातों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश से जुड़े कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दायर एक मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था. फैसला सुनाने से पहले पीठ ने एक लंबा फैसला पढ़ा.

याचिकाएं खारिज

खालिद और इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त सबूत पेश किए हैं जो आपराधिक साजिश में दोनों की संलिप्तता को दर्शाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नामजद प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों में अंतर करते हुए कहा कि वह जमानत के मामले में सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार नहीं कर सकता.

पीठ ने कहा, 'उमर खालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं. भागीदारी के क्रम के अनुसार न्यायालय को प्रत्येक आवेदन का व्यक्तिगत रूप से मूल्यांकन करना होगा.'