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फ्रिज फेल, देसी दिमाग पास, गांवों का वो नेचुरल सिस्टम जो आज भी कमाल करता है

दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग बिना फ्रिज या बिजली के भी पारंपरिक और स्वदेशी तरीकों से भोजन को सुरक्षित और ताजा रखते हैं. राजस्थान का जीर पॉट, पहाड़ी क्षेत्रों में बहते पानी पर लटकती टोकरियाँ जैसे तरीके आज भी कारगर हैं.

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Yogita Tyagi

क्या बिना फ्रिज के खाना ताजा और सेफ रखा जा सकता है? सुनने में मुश्किल लगता है, लेकिन देश के कई ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में आज भी लोग बिना बिजली या आधुनिक तकनीक के खाने को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं. ये पारंपरिक और स्वदेशी तकनीकें न केवल पर्यावरण के लिए अच्छी हैं, बल्कि मौसम बदलने के दौरान एक अच्छा लाइफस्टाइल भी देती हैं. राजस्थान से लेकर हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों तक, स्थानीय समुदायों ने सालों से ऐसे तरीके अपनाए हैं, जो भोजन को खराब होने से बचाते हैं. यहां तक कि शहरी जीवन में भी, इन तकनीकों को अपनाकर बिजली की खपत कम की जा सकती है और भोजन की बर्बादी रोकी जा सकती है.

राजस्थान और रेगिस्तानी इलाकों में ‘ज़ीर पॉट’ को रेगिस्तान का फ्रिज कहा जाता है. यह दो मिट्टी के बर्तनों का बना होता है. एक बड़े बर्तन के अंदर छोटा बर्तन रखा जाता है और दोनों के बीच गीली रेत भरी जाती है. इसके बाद इसके ऊपर नम कपड़ा ढकते ही भोजन ठंडा होने लगता है. इस तरीके से सब्जी, फल, दूध और कभी-कभी पके हुए भोजन को भी एक-दो दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

हिमाचल- उत्तराखंड में अपनाया जाता है ये तरीका 

उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों, खासकर हिमाचल और उत्तराखंड में, बहते पानी के ऊपर टोकरी या बर्तन लटकाने की परंपरा है. यह ठंडे पानी के माध्यम से टेम्परेचर को कंट्रोल रखता है, जिससे खाना ज्यादा देर तक ताजा रहता है. इस विधि में सब्जियों को कीड़ों से बचाने के लिए जालीदार टोकरी का इस्तेमाल होता है. 

तमिलनाडु में कैसे ठंडी रहती है चीजें? 

कोल्ड स्टोरेज के अभाव में, समुद्र तटीय इलाकों जैसे केरल और तमिलनाडु में मछली और मांस को नमक में डालकर और धूप में सुखाकर संरक्षित किया जाता है. पूर्वोत्तर भारत में भी आदिवासी समुदाय इसी तरह से सब्जियां संरक्षित करते हैं. यह तरीका न केवल आसान है, बल्कि स्वाद और पोषण को भी बनाए रखता है.

गुजरात-MP वाले अपनाते हैं ये तरीका 

गुजरात और मध्य प्रदेश के ग्रामीण हिस्सों में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग पानी, छाछ और पके हुए चावल को ठंडा रखने के लिए किया जाता है. मिट्टी की प्राकृतिक विशेषताएं गर्मी को बाहर रोकती हैं. इन्हें छायादार स्थानों पर रखने और गीले बोरे से ढकने पर और भी ठंडक मिलती है.

कश्मीर-नेपाल में भी है खास तकनीक 

कश्मीर और नेपाल जैसे ठंडे क्षेत्रों में लोग जड़ वाली सब्जियों को भूमिगत गड्ढों में रखते हैं. मिट्टी का स्थिर तापमान उन्हें खराब होने से बचाता है. शहरी क्षेत्रों में भी मिट्टी की टोकरी का उपयोग कर यह तरीका अपनाया जा सकता है.

हिमालयी क्षेत्रों की खास है परंपरा 

सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में किण्वन की परंपरा पुरानी है. गुंड्रुक और सिंकी जैसे व्यंजन न केवल खाने को लंबे समय तक चलाते हैं, बल्कि हेल्दी भी होते हैं. पत्तागोभी या मूली को नमक और मसालों के साथ जार में भरकर खमीर उठाने पर स्वाद और पोषण दोनों सुरक्षित रहते हैं. ओडिशा और महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में जड़ वाली सब्जियों को राख और भूसी में दबाकर संरक्षित किया जाता है. इससे नमी और कीड़े दूर रहते हैं. हल्दी, अदरक और लहसुन को इस विधि से लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.