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Christmas मनाते हैं लेकिन जानते हैं कौन थे सांता क्लॉज, क्या सच में बांटते थे तोहफे? ये है उनकी अनसुनी दास्तान

क्रिसमस 2025 की रौनक के बीच सांता क्लॉज की कहानी फिर चर्चा में है. सांता असल में सेंट निकोलस थे, जो 280 ईसवी में मायरा में जन्मे.

Gemini
Reepu Kumari

नई दिल्ली: क्रिसमस आते ही घरों, बाजारों और स्कूलों में उत्साह चरम पर पहुंच जाता है. भारत में यह त्योहार अब सिर्फ ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर वर्ग इसे अपने अंदाज में मनाता है. सबसे ज्यादा रोमांच बच्चों में होता है, क्योंकि उनसे जुड़ी कहानियों में एक नाम हमेशा चमकता है-सांता क्लॉज. वही सांता, जो रात में दबे कदमों से आकर उपहार रख जाता है.

पर क्या सांता सिर्फ कल्पना का पात्र हैं या इतिहास में ऐसा कोई इंसान सच में था? बच्चों को तोहफे देने की परंपरा का जन्म कैसे हुआ, और क्या वाकई कोई संत रात में गिफ्ट बांटते थे? इन सवालों के जवाब एक दिलचस्प, प्रेरणादायक और कम सुनी गई कहानी में छिपे हैं, जो आज भी दुनिया के सबसे प्यारे त्योहार की आत्मा मानी जाती है.

क्रिसमस की तारीख के पीछे की सच्चाई

25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की शुरुआत ईसा मसीह के जन्म के सम्मान में हुई. ईसाई मान्यताओं में यीशु को ईश्वर का संदेशवाहक और मानवता का मार्गदर्शक माना गया. इस दिन चर्चों में प्रार्थनाएं होती हैं, विशेष गीत गाए जाते हैं और सेवा कार्य किए जाते हैं. त्योहार का मुख्य संदेश प्रेम, दया और साझा खुशियों का है. यही वजह है कि क्रिसमस अब वैश्विक एकता का प्रतीक बन चुका है.

सांता की असल पहचान

सांता क्लॉज दरअसल सेंट निकोलस थे. उनका जन्म 280 ईसवी में मायरा शहर में हुआ, जो आज के तुर्किये का हिस्सा है. बचपन में माता-पिता के निधन ने उनके जीवन को कठिन बना दिया, लेकिन उन्होंने दुख को अपनी ताकत बनाया. आस्था और सेवा उनके जीवन का आधार बने. पहले पादरी और फिर बिशप के रूप में उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम किया और अपनी अलग पहचान बनाई.

उपहार देने की शुरुआत कैसे हुई

निकोलस का दिल बच्चों के लिए बेहद कोमल था. गरीबी में गुजरे बचपन ने उन्हें दूसरों के दर्द को समझने की क्षमता दी. वह बच्चों को खुश करने और जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए रात में गुप्त रूप से उपहार रखते थे. वह नहीं चाहते थे कि दान का प्रचार हो, इसलिए उन्होंने यह नेक काम बिना पहचान उजागर किए किया. यही आदत बाद में गिफ्ट देने की क्रिसमस परंपरा की नींव बनी.

सिंटरक्लॉस से सांता बनने तक का सफर

अमेरिका में डच लोककथा के चरित्र ‘सिंटरक्लॉस’ से प्रेरित होकर सेंट निकोलस को सांता क्लॉज कहा जाने लगा. सिंटरक्लॉस की छवि हंसमुख, दयालु और उपहार देने वाले संत की थी. धीरे-धीरे यह नाम पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. लाल कपड़ों और बारहसिंगों पर सवार होकर गिफ्ट बांटने वाली कहानी भी इसी सांस्कृतिक विस्तार का हिस्सा बनी, जिसने बच्चों की कल्पनाओं को पंख दिए.

सेवा और प्रेरणा की विरासत

सेंट निकोलस का निधन 6 दिसंबर 343 ईसवी में मायरा में हुआ. आज भी उनकी कहानी का मूल संदेश उपहार नहीं, बल्कि सेवा की भावना है. क्रिसमस पर सांता की छवि हमें सिखाती है कि खुशी बांटने के लिए शोहरत की जरूरत नहीं होती. एक छोटा सा नेक कदम किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है. यही सांता की सबसे बड़ी विरासत है, जो दिलों में जिंदा है.