पर्यावरण पर विनाशकारी असर के बावजूद 2021 के बाद दुनिया भर में शुरू हुए 28 ‘कार्बन बम’ प्रोजेक्ट : रिपोर्ट
दुनिया भर में जलवायु संकट की चेतावनियों के बावजूद, 2021 से अब तक 28 नए 'कार्बन बम' प्रोजेक्ट शुरू हो चुके हैं.
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया में चिंता बढ़ती जा रही है, लेकिन इसके बावजूद नई जीवाश्म ईंधन परियोजनाएं लगातार शुरू की जा रही हैं. ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2021 के बाद से 28 'कार्बन बम' प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं, जिनसे करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होगा.
ये वही साल है जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने चेताया था कि नए तेल और गैस प्रोजेक्ट शुरू करना जलवायु लक्ष्यों के विपरीत है.
कार्बन बम क्या हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक, 'कार्बन बम' वे तेल, गैस या कोयला परियोजनाएं हैं जो अपने संचालन काल में एक अरब टन से ज्यादा CO2 उत्सर्जन कर सकती हैं. 2022 में जारी एक शोध में ऐसे 425 प्रोजेक्ट दुनिया भर में पाए गए थे. इनमें से 365 अब भी सक्रिय हैं, जबकि कुछ का उत्पादन घटाया गया है या उनकी क्षमता पुनः आंकी गई है. ये प्रोजेक्ट जलवायु संकट के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं.
सबसे बड़े प्रदूषक देश
रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन इन 'कार्बन बम' प्रोजेक्ट्स का 43 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि रूस का 9 प्रतिशत और अमेरिका का 5 प्रतिशत हिस्सा है. पश्चिमी देशों की कई बड़ी तेल कंपनियां इसमें शामिल हैं, लेकिन उत्सर्जन के मामले में सऊदी अरामको और चीन की CHN एनर्जी सबसे आगे हैं. विशेषज्ञों ने कहा कि ये देश जलवायु समझौतों की अनदेखी कर अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
छोटे प्रोजेक्ट भी बड़ा खतरा
एनजीओ रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि 2021 के बाद से 2,300 से अधिक छोटे उत्खनन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है, जो प्रत्येक पांच मिलियन टन से अधिक CO2 उत्सर्जित करने की क्षमता रखते हैं. यह उत्सर्जन पेरिस जैसे शहर की सालाना कार्बन मात्रा के बराबर है. इन सभी प्रोजेक्ट्स से संयुक्त रूप से जितना उत्सर्जन होगा, वह वैश्विक 'कार्बन बजट' से 11 गुना ज्यादा है, यानी 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा अब सिर्फ कागजों में रह जाएगी.
बैंकों की भूमिका और बढ़ता संकट
2021 से 2024 के बीच, दुनिया की 65 सबसे बड़ी बैंकों ने इन प्रदूषणकारी प्रोजेक्ट्स में शामिल कंपनियों को 1.6 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग दी है. इससे साफ है कि वैश्विक वित्तीय संस्थान अब भी जीवाश्म ईंधन उद्योग को मजबूती दे रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन परियोजनाओं को नहीं रोका गया तो अगले दशक में पेरिस समझौते का तापमान लक्ष्य हासिल करना असंभव हो जाएगा.
भविष्य की चेतावनी
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर ऐसे प्रोजेक्ट जारी रहे तो इस दशक के अंत तक पृथ्वी का तापमान पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ जाएगा. एनजीओ ने देशों से तुरंत जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग को कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की अपील की है, ताकि मानवता को जलवायु आपदा से बचाया जा सके.