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'निशिकांत को 6 किताबें, राहुल को एक कोट नहीं ', प्रियंका गांधी ने संसद की कार्यवाही न चलने के लिए केंद्र को बताया जिम्मेदार

प्रियंका गांधी ने संसद में पक्षपात का आरोप लगाते हुए सरकार को घेरा. उन्होंने विपक्ष की आवाज दबाने को लोकतंत्र का अपमान बताया और चीन सीमा विवाद पर निर्णयहीनता तथा इतिहास के बहाने मुद्दों से ध्यान भटकाने की कड़ी आलोचना की.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: संसद में राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले जिक्र कर जनरल नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक का संदर्भ प्रस्तुत करने पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी घमासान थमने का नाम नहीं ले रही है. कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने मीडिया से बात करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने सत्ता पक्ष पर सदन की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने और विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाया. प्रियंका ने निशिकांत दुबे और राहुल गांधी के भाषणों के बीच बरते गए भेदभाव को लोकतंत्र के लिए काला अध्याय बताया.

प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि जब भी मोदी सरकार सदन को बाधित करना चाहती है, वह निशिकांत दुबे को बोलने के लिए खड़ा कर देती है. उन्होंने भेदभाव का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां नेता विपक्ष राहुल गांधी को एक किताब से संदर्भ देने की अनुमति नहीं मिली, वहीं निशिकांत दुबे छह किताबें लेकर बैठे रहे और उनसे उद्धरण देते रहे. सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि उनका माइक भी बंद नहीं किया गया.

'करोड़ों मतदाताओं के प्रतिनिधित्व का अपमान'

कांग्रेस सांसद ने जोर देकर कहा कि मोदी सरकार यह जताना चाहती है कि संसद में सिर्फ उनकी ही मर्जी चलेगी. उन्होंने इसे स्पीकर के पद, संसद और लोकतंत्र का निरादर बताया. प्रियंका के अनुसार, नेता विपक्ष केवल एक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह पूरे विपक्ष और उन करोड़ों मतदाताओं का प्रतिनिधि होता है जिन्होंने उन्हें वोट दिया है. विपक्ष की आवाज दबाना सीधे तौर पर देश की उस जनता का मुंह बंद करने जैसा है, जो सरकार से जवाब चाहती है.

'इतिहास की आड़ में ध्यान भटकाने की सनक' 

सदन में चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष द्वारा बार-बार पूर्ववर्ती सरकारों पर निशाना साधने पर प्रियंका ने आपत्ति जताई. उन्होंने इसे सरकार की एक 'सनक' करार दिया और कहा कि इसका उपयोग केवल जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटकाने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार अपनी वर्तमान विफलताओं को छिपाने के लिए इतिहास और पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम का सहारा लेती है. एक तरफ जहां ज्वलंत मुद्दों पर नेता विपक्ष को बोलने से रोका जाता है, वहीं दूसरी तरफ फिजूल की बातें बुलवाई जाती हैं.

'सीमा सुरक्षा पर निर्णय लेने में विफलता' 

प्रियंका ने जनरल नरवणे की पुस्तक का संदर्भ देते हुए चीन सीमा विवाद पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कहा कि जब चीनी सेना हमारी सीमा पर थी, तब सत्ता में बैठे नेता निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे. सरकार ने दो घंटे की देरी के बाद सेना को खुद फैसला लेने का आदेश दिया. प्रियंका ने कटाक्ष किया कि जो भाजपा नेता आज इंदिरा गांधी और इतिहास की बातें करते हैं, वे संकट के समय सेना को स्पष्ट निर्देश देने में भी विफल रहे.