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ग्राहम स्टेंस हत्याकांड का दोषी महेंद्र हेमब्रम 25 साल बाद रिहा, समर्थकों ने लगाए जय श्री राम के नारे

हेम्ब्रम के समर्थकों का दावा है कि जेल में रहने के दौरान उनमें सुधार हुआ है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इससे उनके अपराध की क्रूरता या जिस राजनीतिक संदर्भ में यह हुआ, उसे नहीं मिटाया जाना चाहिए. तथ्य यह है कि संघ परिवार के कुछ सदस्य उनकी रिहाई का जश्न मना रहे हैं.

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Mayank Tiwari

भारत को दहला देने वाले 1999 के ग्रैहम स्टेन्स हत्याकांड के दोषी महेन्द्र हेंबरम को 25 सालों की सजा पूरी करने के बाद 'अच्छे व्यवहार' के आधार पर केओंझार जेल से रिहा कर दिया गया. यह रिहाई ओडिशा राज्य दंड समीक्षा बोर्ड की अनुशंसा पर हुई, लेकिन इस फैसले ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है.  

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रैहम स्टेंस, एक ईसाई मिशनरी, जो ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में कुष्ठ रोगियों की सेवा कर रहे थे, अपने दो मासूम बेटों—फिलिप और टिमोथी—के साथ एक गाड़ी में सो रहे थे, जब महेन्द्र हेंबरम और उसके साथियों ने जानबूझकर उस वैन में आग लगा दी. इस नृशंस कृत्य में तीनों की जीवित जलाकर हत्या कर दी गई. इस बर्बर घटना ने देश और विदेश में आक्रोश की लहर पैदा कर दी थी.

CBI कोर्ट ने आरोपियों को ठहराया था दोषी

इस पूरे प्रकरण को हाल के भारतीय इतिहास में सबसे क्रूर और मूर्खतापूर्ण अपराधों में से एक माना जाता है, जो धार्मिक उग्रवाद और हिंसा के खतरनाक मिश्रण को उजागर करता है. इस अपराध ने न केवल स्टेंस परिवार और उनके समुदाय पर गहरा भावनात्मक घाव छोड़ा, बल्कि हमले की क्रूरता पर व्यापक आक्रोश के साथ वैश्विक स्तर पर भी इसकी गूंज हुई. इसके बाद, कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और महेंद्र हेम्ब्रम को 13 अन्य लोगों के साथ सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराया. हालांकि, जेल में सिर्फ़ 25 साल की सज़ा काटने के बाद उनकी रिहाई को एक विवादास्पद कृत्य माना जाता है.

रिहाई पर जश्न और 'जय श्रीराम' के लगे नारे

बता दें कि, दोषी महेन्द्र हेंबरम को जेल से रिहाई मिलने के बाद उसे फूलों की माला पहनाकर स्वागत किया गया और 'जय श्रीराम' के नारे लगाए गए. जो सांप्रदायिक राजनीति से जुड़ी विचारधारा के साथ जोड़े जाते हैं. यह दृश्य न केवल पीड़ित परिवार की पीड़ा को अनदेखा करता है, बल्कि समाज में धार्मिक कट्टरता के सामान्यीकरण पर भी चिंता बढ़ाता है.

न्याय या नैतिक पतन?

हालांकि हेंबरम को "अच्छे व्यवहार" के आधार पर रिहा किया गया है, परंतु इस फैसले पर कई सामाजिक और कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं. “क्या किसी निर्दोष की हत्या का अपराध समय के साथ मिट सकता है?” यह सवाल अब आम जनमानस में गूंज रहा है. वहीं, रिहाई के समर्थक, विशेष रूप से संघ परिवार से है, वे तर्क देते हैं कि हेमब्रम का पुनर्वास एक पॉजिटिव परिणाम है, जो यह सुझाव देता है कि लोग समय के साथ बदल सकते हैं. हालाँकि, आलोचकों का मानना ​​है कि उनके कार्यों का जश्न मनाना न्याय और जवाबदेही के बारे में गलत संदेश भेजता है.

दारा सिंह अब भी जेल में, लेकिन राजनैतिक समर्थन बना हुआ

इस मामले के मुख्य आरोपी दारा सिंह दारा सिंह और अन्य दोषियों की स्थिति जबकि हेमब्रम की रिहाई ने केंद्र में जगह बना ली है, मामले में मुख्य दोषी दारा सिंह अभी भी जेल में है. सिंह, जो हत्याओं के पीछे का मास्टरमाइंड था, उसको शुरू में मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में उसकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया.

उनकी रिहाई के लिए चलाए गए अभियान को ओडिशा के वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन माझी सहित महत्वपूर्ण राजनीतिक समर्थन मिला था, जो कि क्योंझर से विधायक थे. हालांकि, दारा सिंह का भाग्य अभी भी चल रही कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है, और उनकी रिहाई अनिश्चित बनी हुई है. इस मामले में कई अन्य व्यक्ति भी शामिल थे, जिनमें से कुछ को बरी कर दिया गया, जबकि अन्य की सजा कम कर दी गई.

न्याय प्रणाली बनाम राजनीति और विचारधारा

हेंबरम की रिहाई को कुछ लोग “पुनर्वास की सफलता” बताते हैं, लेकिन जब उसका स्वागत एक नायक की तरह होता है, तो यह पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाता है. न्याय केवल दंड देने तक सीमित नहीं, वह पीड़ित के सम्मान की रक्षा और समाज में संतुलन बनाए रखने का भी माध्यम है.