गुजरात में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपना दबदबा बरकरार रखते हुए शानदार क्लीन स्वीप किया है. नगर निगमों, नगर पालिकाओं और जिला पंचायतों में पार्टी ने प्रचंड जीत हासिल की है, लेकिन इस भगवा सुनामी के बीच भी बीजेपी के कुछ हाई-प्रोफाइल उम्मीदवारों को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है. इनमें सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व आईपीएस अधिकारी मनोज निनामा और आम आदमी पार्टी छोड़कर आए पूर्व विधायक भूपत भायाणी की हार की हो रही है.
गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी मनोज निनामा को पुलिस विभाग में 42 साल की लंबी सेवा का अनुभव था. उनका रिटायरमेंट 31 मई को होने वाला था, लेकिन चुनावी अखाड़े में किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने ठीक पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली और बीजेपी में शामिल हो गए. पार्टी ने उन्हें अरावली जिले के शामलाजी तालुका की ओध जिला पंचायत सीट से ऐन मौके पर उम्मीदवार बनाया था.
निनामा के राजनीति में आने के पीछे उनके करीबी दोस्त, पूर्व IPS और वर्तमान में गुजरात सरकार के राज्य मंत्री पी.सी. बरंडा का बड़ा हाथ माना जाता है. निनामा ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. सबसे दिलचस्प बात यह है कि निनामा को कांग्रेस की सेजल गोहेल ने हराया, जो चुनाव से ठीक पहले बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई थीं.
बीजेपी के लिए दूसरी बड़ी शर्मिंदगी भूपत भायाणी की हार रही. भायाणी पहले आम आदमी पार्टी के विधायक थे, लेकिन बाद में विधायक पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा देकर बीजेपी में आ गए. बीजेपी ने उन्हें जिला पंचायत सदस्य का टिकट दिया था, लेकिन दल-बदल को शायद जनता ने स्वीकार नहीं किया. भायाणी को उसी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के हाथों करारी शिकस्त मिली, जिसे वे छोड़कर आए थे.
इन बड़े झटकों के बीच, बीजेपी के लिए राहत की बात यह रही कि आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए किसान नेता राजू करापाड़ा अपना चुनाव जीतने में सफल रहे. हालांकि, सुरेंद्रनगर जिले की मूली-2 सीट से चुनाव लड़ने वाले पार्टी के एक अन्य उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. इस चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता की लहर के बावजूद जमीनी समीकरण और उम्मीदवारों का दल-बदल जनता के फैसलों पर बड़ा असर डालता है.