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1 करोड़ लोग छोड़ चुके हैं इस्लाम? केरल से उठी 'एक्स मुस्लिम' लहर, ईरान आंदोलन की गूंज भारत में

ईरान में सरकार विरोधी आंदोलन के बीच एक्स मुस्लिम मुहिम तेज हुई है. इसका असर भारत तक महसूस किया जा रहा है, जहां कुछ लोग खुलकर धर्म छोड़ने और नई पहचान अपनाने की बात सामने रख रहे हैं.

Grok
Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: ईरान में महंगाई और शासन के खिलाफ चल रहा आंदोलन अब केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रह गया है. यह धार्मिक पहचान और आस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है. इसी के साथ ‘एक्स मुस्लिम’ मुहिम को नई ऊर्जा मिलती दिख रही है. इस बदलाव की गूंज भारत में भी सुनाई देने लगी है. हालांकि, दोनों देशों में हालात अलग हैं, लेकिन धर्म, पहचान और स्वतंत्र सोच को लेकर उठते सवालों में कुछ समानताएं देखी जा रही हैं.

ईरान में जारी आंदोलन धीरे धीरे इस्लामिक शासन व्यवस्था के विरोध में बदलता नजर आ रहा है. कई लोग इसे बाहरी प्रभाव बता रहे हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को मूल पारसी धर्म से जोड़ने की बात कर रहे हैं. वहां इस्लाम के प्रति अनिच्छा अब खुलकर व्यक्त की जा रही है. प्रदर्शन केवल महंगाई या प्रशासन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि धार्मिक व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं.

भारत में इंटरनेट पर बढ़ता विमर्श

भारत में एक्स मुस्लिम से जुड़ा विमर्श फिलहाल अधिकतर इंटरनेट मीडिया तक सीमित है. एक्स, यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे मंचों पर लोग अपने अनुभव साझा कर रहे हैं. खुलकर सामने आने में अब भी परिवार और सामाजिक प्रतिक्रिया का डर बना रहता है. इसके बावजूद कुछ लोग हिम्मत दिखा रहे हैं और सार्वजनिक मंचों पर अपनी पहचान और फैसले को सामने ला रहे हैं.

मंच से नाम बदलने की घोषणा

हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आर्य समाज के एक कार्यक्रम के दौरान इमरोज आलम ने मंच से अपना नाम राजन चौधरी रखने की घोषणा की. उन्होंने खुद को एक्स मुस्लिम बताया. उनके जैसे कई अन्य लोग दावा करते हैं कि देश में एक्स मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. हालांकि, इन आंकड़ों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है. फिर भी यह मुहिम अब उत्तर भारत तक पहुंच चुकी है.

परिवार सहित धर्म परिवर्तन की कहानी

चंडीगढ़ के जावेद इकबाल ने कुछ माह पहले हिंदू धर्म अपनाकर अपना नाम जीतेंद्र गौड़ रखा. उन्होंने अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सनातन धर्म ग्रहण किया. जावेद का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक दोनों धर्मों को समझा. कट्टरता, महिलाओं की स्थिति और सवाल पूछने की आजादी जैसे मुद्दों पर विचार करने के बाद उन्होंने यह फैसला लिया. यह रास्ता आसान नहीं था, लेकिन बच्चों ने इसे सहजता से अपनाया.

चुनौतियां और सामाजिक सवाल

सनातन धर्म अपनाने के बाद भी चुनौतियां खत्म नहीं होतीं. इमरोज आलम बताते हैं कि कई जगह उन्हें पूर्व में मुस्लिम होने के कारण घर लेने में दिक्कत आती है. बच्चों के विवाह को लेकर भी चिंता बनी रहती है. धार्मिक संगठनों का मानना है कि जैसे जैसे संख्या बढ़ेगी, ये समस्याएं कम होंगी. यह बदलाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी नए सवाल खड़े कर रहा है.