दो कमरों का घर और आसमान से ऊंचा सपना... गरीबी में जन्में धीरूभाई अंबानी ने कैसे खड़ा किया अरबों का साम्राज्य
धीरूभाई अंबानी की जयंती पर जानिए उनकी संघर्ष भरी कहानी के बारे में. दो कमरों के घर में पले धीरूभाई ने 16 साल की उम्र में घर छोड़ा और अपनी सोच, साहस और समझ से भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया.
नई दिल्ली: 28 दिसंबर का दिन भारतीय उद्योग जगत के लिए खास है. इसी दिन जन्म हुआ उस व्यक्ति का, जिसने आजादी के बाद के भारत में कारोबार और निवेश की परिभाषा बदल दी. धीरूभाई अंबानी की जयंती केवल एक उद्योगपति का जन्मदिन नहीं, बल्कि उस सोच का जश्न है जिसने आम आदमी को शेयर बाजार से जोड़ा और बड़े सपने देखने का हौसला दिया.
धीरूभाई अंबानी का जन्म 28 दिसंबर 1932 को गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के चोरवाड़ गांव में हुआ. उनके पिता हीराचंद अंबानी एक साधारण स्कूल मास्टर थे. ईमानदार और अनुशासनप्रिय, लेकिन आमदनी बेहद सीमित. मिट्टी के फर्श वाला दो कमरों का छोटा सा घर और बड़ा परिवार. यही धीरूभाई की शुरुआती दुनिया थी. बचपन में ही उन्होंने समझ लिया था कि गरीबी केवल सुविधाएं नहीं छीनती, बल्कि आत्मसम्मान को भी चोट पहुंचाती है. यही एहसास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.
स्कूल और आंदोलन से मिली सिस्टम की समझ
जूनागढ़ के बहादुर कंजी हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान धीरूभाई स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. वे जूनागढ़ विद्यार्थी संघ के सचिव बने. इसी दौर में उनकी वह खास आदत सामने आई, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी. नियमों को तोड़े बिना रास्ता निकालना. एक कार्यक्रम में भाषण पर रोक लगी, तो उन्होंने खुद बोलने के बजाय किसी और से भाषण करवा दिया. नियम भी बचा और उद्देश्य भी पूरा हुआ. यही सोच आगे चलकर बड़े कारोबारी फैसलों में दिखी.
16 साल की उम्र में छोड़ा घर और देश
1949 में मैट्रिक के बाद घर की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि आगे पढ़ाई हो सके. 16 साल की उम्र में धीरूभाई ने घर छोड़ दिया और रोजी रोटी की तलाश में यमन के अदन पहुंचे. उस समय अदन एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र था. यहां उन्हें ए बी बीसे एंड कंपनी में नौकरी मिली. अदन का बाजार उनके लिए किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं था. यहीं उन्होंने असली दुनिया की पढ़ाई शुरू की.
अदन में धीरूभाई ने देखा कि यमन की मुद्रा चांदी से बनी है और उसकी धातु की कीमत सरकारी मूल्य से अधिक है. उन्होंने बाजार से सिक्के खरीदे, चांदी अलग की और बेच दी. कुछ ही महीनों में उन्होंने अच्छी खासी कमाई कर ली. सरकार को जब यह समझ आया, तब नियम बदल दिए गए. लेकिन तब तक धीरूभाई यह सीख चुके थे कि सही जानकारी और सही समय किसी भी अवसर को बड़ा बना सकता है.
जल्दी अमीर बनने की नहीं, लंबी सोच
अदन में रहते हुए धीरूभाई ने सिर्फ पैसा नहीं कमाया. उन्होंने अकाउंटिंग, सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बारीकियां सीखीं. वे सादा जीवन जीते और धीरे धीरे पूंजी जोड़ते रहे. यहीं उनकी सोच बनी कि असली जीत लंबी दौड़ की तैयारी में है, न कि जल्दबाजी में.
कुछ वर्षों बाद धीरूभाई भारत लौटे. बड़ी पूंजी नहीं थी, लेकिन अनुभव और आत्मविश्वास भरपूर था. उन्होंने मसालों और यार्न के ट्रेडिंग बिजनेस से शुरुआत की. उस दौर में भारत लाइसेंस परमिट राज में जकड़ा हुआ था. हर फाइल एक चुनौती थी. धीरूभाई ने सिस्टम से टकराने के बजाय उसे समझा और उसी दायरे में रास्ते निकाले. अफसरशाही से रिश्ते बनाए और भरोसे के साथ काम किया.
छोटे कदम और बड़े सपनों की तैयारी
ट्रेडिंग से मिले अनुभव और पूंजी ने धीरूभाई को उद्योग की ओर बढ़ने की ताकत दी. उन्होंने पहचाना कि भारत में कपड़े की मांग बहुत बड़ी है और भविष्य पॉलिएस्टर का है. छोटे कदम, साफ रणनीति और बड़े सपनों के साथ उन्होंने आगे बढ़ना शुरू किया. यही सफर आगे चलकर Reliance Industries की नींव बना.
आज रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है. धीरूभाई अंबानी का निधन 6 जुलाई 2002 को हुआ, लेकिन उनकी सोच आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है. एक साधारण घर से निकलकर असाधारण इतिहास रचने की यह कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा मिसाल बनी रहेगी.