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'...तो ये हाल न होता', राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों के 'आप' छोड़ने पर सामने आया अन्ना हजारे का बयान

अन्ना हजारे ने आम आदमी पार्टी से सात राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है. उन्होंने केजरीवाल नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पार्टी सही रास्ते पर चलती, तो राघव चड्ढा जैसे पुराने साथी साथ नहीं छोड़ते.

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में मीडिया से बात करते हुए वयोवृद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे ने आम आदमी पार्टी में मची इस बड़ी सियासी भगदड़ पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है. राघव चड्ढा समेत सात दिग्गज राज्यसभा सांसदों के अचानक इस्तीफा देकर भाजपा के साथ विलय करने को उन्होंने सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व की विफलता करार दिया है. अन्ना का मानना है कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र राय रखने का संवैधानिक अधिकार है और शायद इन नेताओं को पार्टी के भीतर किसी गंभीर परेशानी या घुटन का सामना करना पड़ रहा था.

अन्ना हजारे ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और सही रास्ते पर अडिग रहती, तो आज सांसदों को इस तरह सामूहिक पलायन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. उन्होंने पार्टी आलाकमान को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए संकेत दिया कि पार्टी के भीतर पैदा हुई चुनौतियों के कारण ही इन दिग्गजों ने अपना रास्ता बदला है. अन्ना के अनुसार जब कोई राजनीतिक दल अपने नैतिक मूल्यों से समझौता करने लगता है, तो उसके सबसे समर्पित कार्यकर्ता भी खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगते हैं.

पार्टी छोड़ने पर राघव चड्ढा ने क्या कहा था?

राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ने के फैसले को अपनी अंतरात्मा की आवाज और सिद्धांतों की रक्षा बताया. उन्होंने भावुक होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा और पंद्रह साल का यौवन दिया. वह अब केवल व्यक्तिगत हितों के लिए काम करने लगी है. चड्ढा ने खुद को "गलत पार्टी में सही आदमी करार देते हुए साफ किया कि आप अब देशहित के बजाय निजी स्वार्थों की राजनीति की ओर बुरी तरह मुड़ चुकी है.

राज्यसभा में बहुमत और भाजपा के साथ विलय का गणित 

राघव चड्ढा के नेतृत्व में हुए इस ऐतिहासिक पलायन में संदीप पाठक. अशोक मित्तल. हरभजन सिंह. राजेंद्र गुप्ता. विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल जैसे बड़े नाम शामिल हैं. चड्ढा का दावा है कि राज्यसभा के दो-तिहाई सांसदों ने भाजपा के साथ विलय का सामूहिक निर्णय लिया है. ताकि दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता पर कोई कानूनी संकट न आए. यदि यह विलय आधिकारिक तौर पर स्वीकार हो जाता है. तो उच्च सदन में आम आदमी पार्टी की ताकत घटकर केवल तीन सांसदों तक ही सीमित रह जाएगी.

सांसदों की नाराजगी और नेतृत्व पर गंभीर आरोप

स्वाति मालीवाल ने भी इस्तीफे के तुरंत बाद अरविंद केजरीवाल पर सीधा और तीखा हमला बोला है. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आरोप लगाया कि पार्टी ने उन तमाम पवित्र संकल्पों को छोड़ दिया है जिनके साथ यह आंदोलनकारी यात्रा शुरू हुई थी. दूसरी ओर सांसद विक्रम साहनी ने अपने इस बड़े कदम के पीछे पंजाब के विकास और केंद्र सरकार के साथ बेहतर तालमेल बिठाने की दलील दी है. इन सभी नेताओं के कड़े बयानों से यह साफ हो गया है कि पार्टी के भीतर असंतोष की एक बहुत गहरी लहर चल रही थी.

केजरीवाल के सियासी वजूद के लिए बड़ी चुनौती 

साल 2012 में अन्ना आंदोलन की कोख से जन्मी इस पार्टी के लिए यह इसकी स्थापना के बाद से अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक और नैतिक झटका माना जा रहा है. पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार होने के बावजूद इतने बड़े चेहरों का इस तरह टूटकर जाना केजरीवाल की कार्यशैली पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठाता है. अन्ना हजारे की बेबाक टिप्पणी ने नेतृत्व के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है. अब देखना यह होगा कि पार्टी इस भीषण आंतरिक टूट और नेतृत्व के संकट से भविष्य में कैसे उबरती है.