मुंबई: जब शाहिद कपूर और विशाल भारद्वाज ने ओ रोमियो के लिए दोबारा साथ आने की घोषणा की, तो फैंस के दिलों में उम्मीदें बढ़ना तो तय था. दोनों पहले हैदर और कमीने जैसी फिल्मों से क्रिटिकल और कमर्शियल सफलता दे चुके हैं. ओ रोमियो शुरुआत में वही जादू रचती दिखती है. लेकिन जैसे ही फिल्म दूसरे हाफ में प्रवेश करती है, कहानी की पकड़ ढीली पड़ने लगती है.
फिल्म मुंबई की माफिया क्वींस से प्रेरित है. शाहिद कपूर यहां उस्तारा नाम के गैंगस्टर के रोल में हैं, जो तृप्ति डिमरी की अफशां से प्यार करने के बाद रोमियो बन जाता है. अफशां के पति की हत्या अविनाश तिवारी के किरदार जलाल के हाथों होती है. इसके बाद कहानी बदले और भावनाओं के टकराव की तरफ बढ़ती है. पहले हाफ में टेंशन, मूड और सस्पेंस बना रहता है. लेकिन दूसरा हाफ उसी गहराई को बनाए रखने में संघर्ष करता है.
विशाल भारद्वाज का निर्देशन हमेशा एक खास माहौल रचता है. यहां भी वही धीमा प्यार, रहस्यमय हिंसा और भावनात्मक लेयर दिखती है. सिनेमैटोग्राफी और फ्रेमिंग खूबसूरत है. लेकिन दूसरे हाफ में स्क्रीनप्ले ढीला पड़ जाता है. ट्विस्ट आते हैं, पर उतना असर नहीं छोड़ते. कई सीन जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं. फिल्म खूबसूरत जरूर दिखती है, लेकिन कहानी का भावनात्मक असर धीरे धीरे कम हो जाता है.
उस्तारा के किरदार में शाहिद कपूर चमकते हैं. वह शांत पागलपन और इंटेंसिटी के बीच संतुलन बनाते हैं. उनके चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज फिल्म को मजबूती देते हैं. जब कहानी कमजोर पड़ती है, तब भी शाहिद अपनी परफॉर्मेंस से फिल्म को थामे रखते हैं. तृप्ति डिमरी, अफशां के रोल में दमदार दिखती हैं. उनकी आंखें कई जगह डायलॉग से ज्यादा कहती हैं. उनका किरदार फिल्म की भावनात्मक धुरी बनता है.
अविनाश तिवारी खतरनाक जलाल के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं. उनका फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन और स्क्रीन प्रेजेंस मजबूत है. नाना पाटेकर सीमित स्क्रीन टाइम में असर डालते हैं. विक्रांत मैसी और अन्य कलाकार कैमियो में नजर आते हैं और अपनी छाप छोड़ते हैं.
फिल्म का म्यूजिक इसकी बड़ी ताकत है. अरिजीत सिंह की आवाज बड़े पर्दे पर अलग ही असर डालती है. गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं, रुकावट नहीं बनते. डायलॉग याद रह जाते हैं. खासकर जलाल का संवाद फिल्म की टोन को मजबूत करता है.
पहला हाफ उम्मीद जगाता है. लेकिन दूसरा हाफ उस वादे को निभा नहीं पाता. पेस धीमा हो जाता है. इमोशनल इंटेंसिटी अनइवन हो जाती है. प्यार और हिंसा के बीच का कॉन्सेप्ट दिलचस्प है, लेकिन उसे गहराई से एक्सप्लोर नहीं किया गया. ट्विस्ट प्रेडिक्टेबल लगने लगते हैं.