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स्कर्ट की लंबाई से लेकर अंडरवियर तक, ये 5 अजीब इशारों से चलता है कब आएगी मंदी

अर्थव्यवस्था की चर्चा आते ही आमतौर पर लोग GDP, महंगाई दर या बेरोजगारी जैसी जटिल संख्याओं की बात करते हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि कई बार स्कर्ट की लंबाई, लिपस्टिक की बिक्री या यहां तक कि पुरुषों के अंडरवियर खरीदने की आदतें भी मंदी का अंदाजा पहले ही दे देती हैं.

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Kuldeep Sharma

five Weird Economic Indicators: दुनियाभर में अर्थव्यवस्था की दिशा जानने के लिए सिर्फ भारी-भरकम आंकड़ों की जरूरत नहीं होती. कुछ बेहद साधारण और रोजमर्रा से जुड़े पैटर्न- जैसे स्कर्ट की लंबाई, लिपस्टिक की बिक्री, पुरुषों के अंडरवियर का बाजार, कचरे की मात्रा और सैंडविच की खपत, अक्सर मंदी का संकेत पहले ही दे देते हैं.

इन ट्रेंड्स को 'क्विर्की इंडिकेटर्स' कहा जाता है और पिछली कई मंदियों में ये चौंकाने वाली सटीकता से काम करते रहे हैं.

स्कर्ट की लंबाई और हेमलाइन इंडेक्स

फैशन इंडस्ट्री का एक पुराना नियम कहता है- जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, तो स्कर्ट छोटी होती जाती है और जब हालात बिगड़ते हैं, तो स्कर्ट लंबी हो जाती है. 1960 के दशक की चमकदार अर्थव्यवस्था में मिनी स्कर्ट्स ट्रेंड में थीं, जबकि ग्रेट डिप्रेशन के दौरान महिलाओं के कपड़े जमीन तक झूलते थे. वैज्ञानिक रूप से यह कितना सही है, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतिहास में कई बार यह ट्रेंड मंदी और उछाल के साथ मेल खाता दिखा है.

लिपस्टिक इफेक्ट और छोटे खर्चों की खुशी

2008 की वैश्विक मंदी के दौरान जब दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गई थीं, तब कॉस्मेटिक्स की बिक्री 4.4% बढ़ गई थी. इसे 'लिपस्टिक इफेक्ट' कहा जाता है. जब लोग बड़ी चीजें खरीदने से बचते हैं, तो वे छोटी-छोटी चीजों पर खर्च करके खुशी तलाशते हैं. एक नई लिपस्टिक या कोई छोटा सौंदर्य उत्पाद उनके लिए 'सुलभ विलासिता' बन जाता है. यही वजह है कि मंदी के दौर में ब्यूटी प्रोडक्ट्स की डिमांड बढ़ जाती है.

मेन्स अंडरवीयर इंडेक्स और असली सच्चाई

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के पूर्व चेयरमैन एलन ग्रीन्सपैन का मानना था कि पुरुषों के अंडरवियर का बाजार मंदी का सटीक संकेत देता है. उनकी लॉजिक सीधी थी- जब आर्थिक हालात खराब होते हैं, तो पुरुष नई अंडरवियर खरीदने में भी देरी करते हैं. 2008 की मंदी में पुरुषों के अंडरवियर की बिक्री 2% से ज्यादा गिरी थी, जबकि बाकी कपड़ों की बिक्री पर इसका असर उतना साफ नहीं दिखा था.

कचरा और सैंडविच भी देते हैं संकेत

'Trash Index' बताता है कि जब खपत घटती है, तो कचरा भी कम निकलता है. 2008 की मंदी के दौरान वेस्ट मैनेजमेंट कंपनियों ने लगभग 5% कम कचरा उठाया. वहीं 'Sandwich Index' ऑफिस लंच कल्चर से जुड़ा है. जब जेब ढीली पड़ती है, तो लोग महंगे रेस्तरां से बचते हैं और सस्ते सैंडविच को अपनाते हैं. 2010 की मंदी में ब्रिटेन के टेस्को स्टोर्स ने सैंडविच सेल्स में उछाल दर्ज किया था.

ये सारे ट्रेंड्स भले ही अजीब लगते हों, लेकिन इनमें एक बड़ा संदेश छिपा है- अर्थव्यवस्था का मतलब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की आदतें और भावनाएं भी हैं. जब लोग स्कर्ट लंबी पहनते हैं, सस्ती लिपस्टिक खरीदते हैं, अंडरवियर बदलने में कंजूसी करते हैं, या महंगे खाने की बजाय सैंडविच खाते हैं, तो यह सिर्फ फैशन या पसंद नहीं होती, बल्कि आने वाले आर्थिक संकट का इशारा भी हो सकता है.